
बॉलीवुड के मशहूर कॉमेडियन राजपाल यादव पिछले कई सालों से एक ही नाम से छाए हुए हैं- चेक बाउंस केस। 2010 में उन्होंने अपनी फिल्म “अता पता लापता” बनाने के लिए एक प्रोड्यूसर कंपनी से लगभग 5 करोड़ रुपये का लोन लिया था, जो ब्याज और विलंब के बाद आज लगभग 9 करोड़ तक पहुंच चुका है। जब इस राशि को चुकाने के लिए जारी किए गए चेक बाउंस हो गए, तो मामला कानूनी घेरे में आ गया।
नतीजा: राजपाल यादव और उनकी पत्नी राधा यादव को 2018 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया और 6 महीने की जेल की सजा सुनाई। उसके बाद लंबे अपील‑प्रक्रिया के बाद 5 फरवरी 2026 को राजपाल यादव ने दिल्ली की तिहाड़ जेल में सरेंडर कर दिया और कुछ दिनों बाद कोर्ट से अंतरिम जमानत मिल गई। इस पूरे घटनाक्रम ने आम आदमी के दिमाग में एक सवाल तैयार कर दिया है- क्या सच में एक चेक बाउंस आपको जेल तक भेज सकता है? और अगर गलती से भी चेक बाउंस हो जाए तो क्या सजा निश्चित है?
चेक बाउंस का कानूनी आधार
दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट प्रवीण झा से हुई विस्तृत बातचीत के आधार पर इस सवाल का जवाब साफ है: हां, चेक बाउंस आपको जेल तक भेज सकता है, लेकिन सिर्फ तभी जब कानूनी और प्रक्रियात्मक तौर पर सभी शर्तें उस दिशा में पूरी हो जाएं। धारा 138 के तहत चेक बाउंस को आपराधिक अपराध (criminal offence) माना जाता है, न कि सिर्फ बैंक‑रूल उल्लंघन। यानी चेक बाउंस होने पर आपको सिर्फ चार्ज या फाइन नहीं, बल्कि जेल और अतिरिक्त दंड भी झेलना पड़ सकता है।
प्रक्रिया इस तरह चलती है। जब आपका चेक बैंक में जाकर रिजेक्ट होता है, तो बैंक उसे “चेक बाउंस” या “insufficient funds/mis‑match signature आदि” के आधार पर वापस कर देता है। इसके बाद जिस व्यक्ति या कंपनी को यह चेक दिया गया था, वह चेक बाउंस के 30 दिनों के भीतर एक लिखित “डिमांडिंग नोटिस” चेक इश्यू करने वाले व्यक्ति को भेज सकता है। इस नोटिस में यह स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि चेक 30 दिन पहले बाउंस हुआ था और आपके पास अब 15 दिन का समय भुगतान करने या अपना पक्ष रखने के लिए है।
अगर इन 15 दिनों में भुगतान नहीं होता, तो शिकायतकर्ता के पास विकल्प खुल जाता है कि वह कोर्ट में धारा 138 के तहत आपराधिक केस दर्ज करवाए। इस तरह एक सिविल दावा (लोन वसूली) और एक क्रिमिनल पेनाल्टी दोनों एक साथ चलने लगती हैं।
सजा, जेल और राजपाल यादव का उदाहरण
धारा 138 के तहत सजा क्या है, यह भी जानना जरूरी है। कानून के तहत चेक बाउंस के मामले में अधिकतम 2 साल तक की जेल या चेक की राशि के बराबर या उससे ज्यादा फाइन, या दोनों का प्रावधान है। राजपाल यादव के मामले में कोर्ट ने 6 महीने की सजा सुनाई, जिसे बाद में उन्होंने जेल में काटा, हालांकि अंतरिम राहत और जमानत के बाद वे फिर से घर वापस आ गए लेकिन दायित्व खत्म नहीं हुआ। यही बात बताती है कि जेल की सजा काटने से भी 9 करोड़ का कर्ज नहीं छूटता; वह या तो भुगतान करना पड़ेगा या कानूनी तौर पर सेटलमेंट‑बेस रास्ता ढूंढना पड़ेगा।
हर चेक बाउंस पर जेल जरूरी नहीं- कोर्ट की भूमिका
अब यह सवाल उठता है कि क्या हर चेक बाउंस पर जेल ही पड़ती है? वकील प्रवीण झा कहते हैं कि नहीं, यह आपराधिक अपराध है, लेकिन जेल की सजा “स्वतः निश्चित” नहीं होती। कोर्ट हर बार संदर्भ, इरादा, इतिहास और शर्तें देखता है। जैसे अगर खाता बंद होना, अकाउंट फ्रीज, बैंक‑त्रुटि या शिकायतकर्ता की ओर से कोई गलत प्रक्रिया रही हो, तो आरोपी अपना पक्ष रखकर सजा से बचाव या कमी की कोशिश कर सकता है।
वहीं, अगर कोर्ट को यह लगे कि चेक जानबूझकर बाउंस होने के लिए दिया गया या लगातार धोखा दिया जा रहा है, तो दंड ज्यादा कड़ा हो सकता है। राजपाल यादव के मामले में कोर्ट ने उन्हें लगातार अवहेलना और आदेशों की अनदेखी की वजह से सजा दी, जिसे उन्होंने जेल में काटा।
चेक बाउंस से बचने के लिए व्यावहारिक और कानूनी रास्ते
चेक बाउंस से बचने के लिए कानूनी और व्यावहारिक दोनों तरह की सावधानी जरूरी है। सबसे पहली बात: किसी भी चेक को तभी जारी करें जब आपके अकाउंट में वास्तविक तौर पर पर्याप्त बैलेंस हो। चेक पर तारीख, राशि, नाम और हस्ताक्षर साफ‑सुथरी और बैंक में दर्ज साइन से मिलते‑जुलते होने चाहिए।
अगर किसी कारण से आपको लगे कि चेक पास नहीं हो पाएगा- जैसे बैलेंस की कमी, फंड की देरी या अकाउंट बंद करने की तैयारी- तो उस व्यक्ति को समय रहते सूचित कर देना सही और जिम्मेदारी भरा रवैया माना जाता है। इससे न सिर्फ चेक बाउंस टाला जा सकता है बल्कि बाद में उसका तक आप पर आरोप लगाने की स्थिति भी कमजोर हो जाती है।





