
दिल्ली‑NCR के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की सोशल मीडिया पर चल रही शिकायत ने भारत के IT सेक्टर में कर्मचारियों की बढ़ती निराशा को फिर से उजागर कर दिया है। उसका दावा है कि दो साल तक एक मशहूर बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) में लगातार काम करने के बाद भी उसकी सैलरी में सिर्फ ₹9 की बढ़ोतरी हुई, और इस साल तो वो भी नहीं मिली। इस खुलासे के बाद नोएडा जैसे टेक हब्स के लोगों ने अपनी भी “धोखेबाजी” वाली कहानियां शेयर करनी शुरू कर दीं, जिससे साफ हो जाता है कि बड़ी MNC‑वाली नौकरी के नाम पर युवा इंजीनियर कितने जोखिम में फंस रहे हैं।
इंटर्नशिप से फुल‑टाइम नौकरी तक
उस इंजीनियर ने मई 2024 में नोएडा स्थित एक मशहूर MNC के लिए इंटर्न के रूप में कदम रखा था, जिसके बाद वह फुल‑टाइम पोजीशन में टीम में शामिल हो गया। उसकी उम्मीद थी कि शुरुआती पैकेज 4.25 लाख रुपये सालाना होगा, जो भारतीय टेक जॉब मार्केट के हिसाब से भी एक तरह से “सामान्य” फिगर माना जाता था।
लेकिन असलियत में उसे ऑफर लेटर में लिखे आंकड़ों से काफी कम, बहुत थोड़ी सैलरी मिली, जिससे उसकी आर्थिक उम्मीदें तुरंत हिलने लगीं। उसने खुलकर लिखा कि ग्रेजुएशन के तुरंत बाद जॉब मार्केट इतना खराब था कि उसके पास चुनाव की असली गुंजाइश नहीं थी, इसलिए उसे यह ऑफर स्वीकार करना पड़ा।
2‑साल के बॉन्ड और ₹9 की हाइक
सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह थी कि इस नौकरी के साथ 2‑साल का सर्विस बॉन्ड लगा हुआ था। मतलब, अगर वह 2 साल से पहले नौकरी छोड़ता है तो उसे कंपनी को 1.5 लाख रुपये जमा करने होंगे, और साथ ही 6 महीने का नोटिस पीरियड भी देना पड़ता है। इस तरह उसकी मानसिक दूरी “कब जॉब बदलना है” से ज्यादा “कैसे जॉब बदलना संभव है” की तरफ खिसक गई। पहले साल की हाई परफॉरमेंस और लंबे‑लंबे वर्किंग आउट्स के बाद भी उसे सैलरी हाइक के नाम पर सिर्फ ₹9 का इंक्रीमेंट मिला, जिसे देखकर वह भावनात्मक रूप से टूट गया। उसने लिखा, “और इस साल, उन्होंने मुझे वो भी देने की जहमत नहीं उठाई।।
वीकेंड काम और गुलाम‑जैसी दिनचर्या
इस बात के साथ साथ उसने यह भी बताया कि उससे ऑफिस के काम के साथ‑साथ क्लाइंट साइट्स पर जाने की भी उम्मीद रखी जाती है, जिससे उसकी ट्रैवल और लाइविंग कॉस्ट और बढ़ती है। हर ट्रिप पर हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं, लेकिन कंपनी ट्रैवल खर्चे का कोई हिस्सा नहीं देती।
वीकेंड के दिन भी उसे लगातार काम करना पड़ता है, और वह यह शिकायत करता है कि उससे अक्सर “गुलाम की तरह काम लिया जाता है”, जबकि इसके बदले उसकी सैलरी उतनी ही रहती है, जितनी शुरूआत में थी। थोड़ी राहत यह है कि इन लंबे वीकेंड शिफ्ट्स के बाद उसे compensatory off जरूर मिल जाती है, लेकिन आर्थिक तौर पर वह आगे बढ़ नहीं पा रहा।
रेडिट पोस्ट के बाद वायरल हुआ दर्द
उसने अपनी भावनाओं को रेडिट पर एक पोस्ट के जरिए व्यक्त किया, जिसका शीर्षक था- “मैं इस कंपनी और सहकर्मियों से तंग आ चुका हूं…”। उसने लिखा कि उसे लगता है वह एक ऐसे गड्ढे में फंस चुका है, जहां हर कोई उसका फायदा उठा रहा है, लेकिन वह खुद थोड़े से पैसे भी नहीं बचा पा रहा। इस पोस्ट के वायरल होने के बाद बड़ी संख्या में यूजर्स ने उसकी स्थिति को सपोर्ट किया और यह भी माना कि भारत के लगभग हर सेक्टर में आज इसी तरह की धोखेबाजी चल रही है- जहां कंपनियां युवा वर्कफोर्स को “सीखने का मौका” देने का नाम देकर उनकी मेहनत का असली आर्थिक मूल्य नहीं देतीं।
IT सेक्टर की बढ़ती चिंता
इस पूरी घटना से यह साफ हो जाता है कि आज टेक इंडस्ट्री में न सिर्फ MNC अपनी शाखाएं बढ़ा रही हैं, बल्कि उनके अंदर सिस्टम के तौर पर कर्मचारियों को “बॉन्ड + लो इंक्रीमेंट” के जरिए रोके रखने की चोट लगातार बढ़ रही है। ऐसे में नए इंजीनियरों के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि कंपनी नामी है, बल्कि उन्हें सैलरी स्ट्रक्चर, बॉन्ड की शर्तें, असली भुगतान और नोटिस पीरियड जैसे पॉइंट्स को गहराई से जांचकर ही ऑफर साइन करनी चाहिए। वरना ऐसी ही दशा में डूबने वाला अगला शख्स वह खुद बन सकता है, जो वर्षों तक बस इतना सोचता रह जाता है: “क्या मैंने सही जॉब चुनी थी?”









