
पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर देश भर में चल रही चर्चाओं के पीछे एक कड़वा सच है- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उछाल ने भारतीय तेल कंपनियों (OMCs) पर भारी दबाव डाल रखा है। ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल के पार जाने और पश्चिम एशिया में जारी भू‑राजनीतिक तनाव के कारण भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तीन बड़ी तेल कंपनियां- इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल- घाटे में बिक्री कर रही हैं।
आंकड़े बताते हैं कि डीजल की बिक्री पर तेल कंपनियों को लगभग ₹104.99 प्रति लीटर और पेट्रोल पर लगभग ₹24.40 प्रति लीटर का भारी घाटा (under‑recovery) हो रहा है। इस हिसाब से तीनों कंपनियां मिलकर रोज़ाना लगभग ₹2,000 करोड़ का नुकसान बैठा रही हैं, जो दीर्घकाल में न तो बिज़नेस मॉडल के लिए स्थायी है और न ही वित्तीय रूप से टिकाऊ।
चुनाव के बाद कीमतें कैसे प्रभावित होंगी?
ऐसे में सवाल उठता है कि आगे क्या होगा- क्या चुनाव ख़त्म होते ही पेट्रोल–डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे? सरकारी तर्क साफ है, पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि आम जनता को वैश्विक कीमतों के झटकों से बचाने के लिए नियमित पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर रखी गई हैं। साथ ही हाल में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर की कटौती करके यह संकेत भी दिया गया है कि सरकार तेल कंपनियों के घाटे को कुछ हद तक कम करना चाहती है, लेकिन इसके बावजूद भी कंपनियों पर लागत का बोझ कम नहीं हुआ है।
राजनीतिक चलन और निजी पंपों पर दाम बढ़ने के संकेत
इस बीच राजनीतिक चलन का साफ असर दिख रहा है। आगामी राज्य चुनावों- जैसे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम- को ध्यान में रखते हुए सरकार सीधी बड़ी वृद्धि टाल रही है, लेकिन कुछ माध्यम से दाम में संकेत ज़रूर घुमाए जा रहे हैं। हाल ही में प्रीमियम पेट्रोल (XP100) के दाम दिल्ली में ₹11 बढ़ाकर लगभग ₹160 प्रति लीटर कर दिए गए हैं, जिससे खुदरा बाजार में ईंधन के ब्रांडड उत्पादों की कीमतों का दरवाज़ा खोला गया है।
इसके अलावा कुछ निजी कंपनियां, जैसे नायरा एनर्जी, ने अपनी इनपुट लागत निकालने के नाम पर अपने पंपों पर पेट्रोल–डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी शुरू कर दी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि “मार्केट‑बेस्ड” दृष्टिकोण धीरे‑धीरे सतह पर आने लगी है।
क्या आगे और बढ़ेंगे दाम?
निष्कर्षतः फिलहाल सरकारी तेल कंपनियां कीमतों को औपचारिक रूप से फ्रीज तो कर रही हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की स्थिति और आगामी चुनाव परिणामों के बाद ही पेट्रोल–डीजल कीमतों की अगली दिशा तय होगी। यदि वैश्विक क्रूड भारतीय बाजार पर दबाव बनाए रखता है और राजनीतिक माहौल ढीला पड़ता है, तो आम आदमी की जेब पर ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का दबाव लगभग निश्चित है।









