
जीवन बीमा अब केवल जोखिम सुरक्षा का साधन नहीं रहा, बल्कि एक सशक्त निवेश विकल्प बन चुका है। लेकिन आर्थिक तंगी या अन्य मजबूरियों के चलते लाखों पॉलिसीधारक अपनी LIC पॉलिसी को बीच में ही सरेंडर करने को विवश हो जाते हैं। अच्छी खबर यह है कि भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) के हालिया सुधारों से अब ऐसा करने पर पहले से कहीं ज्यादा राशि मिलेगी। 1 अक्टूबर 2024 से लागू इन नए नियमों ने सरेंडर वैल्यू की गणना को ग्राहक-हितैषी बना दिया है, जिससे पॉलिसीधारकों का नुकसान काफी हद तक कम हो गया है।
पहले के दौर में सरेंडर का नुकसान
पहले के दौर में पॉलिसी के शुरुआती दो वर्षों में सरेंडर करने पर या तो कुछ नहीं मिलता था या बहुत मामूली राशि लौटाई जाती थी। इससे लोग अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा खो देते थे। लेकिन अब IRDAI के नए दिशानिर्देशों के तहत स्पेशल सरेंडर वैल्यू (SSV) अनिवार्य कर दी गई है। इसका मतलब है कि पहला साल पूरा होने के बाद ही आंशिक रिफंड मिलना शुरू हो जाता है। दूसरे साल के अंत तक करीब 30 प्रतिशत, तीसरे साल 35 प्रतिशत, चौथे से सातवें साल के बीच 50 प्रतिशत तक, और मैच्योरिटी से ठीक पहले 90 प्रतिशत तक रिटर्न सुनिश्चित किया गया है।
उदाहरणस्वरूप, यदि किसी ने चार साल तक चार लाख रुपये के प्रीमियम का भुगतान किया हो, तो पहले मात्र 2.4 लाख रुपये मिलते थे, जबकि अब यह राशि बढ़कर लगभग 3.1 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। यह बदलाव नई पॉलिसियों पर लागू होता है, जो पॉलिसीधारकों के लिए वरदान साबित हो रहा है।
सरेंडर वैल्यू क्या है?
सरेंडर वैल्यू आखिर होती क्या है? सरल शब्दों में, जब पॉलिसीधारक अपनी पॉलिसी को मैच्योरिटी से पूर्व स्वेच्छा से बंद करता है, तो बीमा कंपनी द्वारा लौटाई जाने वाली राशि को सरेंडर वैल्यू कहते हैं। यह राशि चुकाए गए प्रीमियमों की संख्या, पॉलिसी की अवधि और बाजार की स्थितियों पर निर्भर करती है। नए नियमों में न्यूनतम भुगतान का सख्त प्रावधान जोड़ा गया है।
अब कंपनियों को कम से कम ‘पेड-अप सम एश्योर्ड’ के बराबर रकम देनी होगी। मान लीजिए, आपने 10 लाख रुपये की पॉलिसी ली और सिर्फ दो साल प्रीमियम भरा, तो आपको करीब दो लाख रुपये तक मिल सकते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि ग्राहक का पैसा पूरी तरह डूब न जाए।
SSV की गणना कैसे होगी
SSV की गणना का आधार भी बदला है। अब इसे हर साल सरकारी 10 साल वाले बॉन्ड की यील्ड से लिंक किया जाएगा, जिसमें बीमा कंपनियां अधिकतम 0.50 प्रतिशत तक अतिरिक्त जोड़ सकती हैं। इससे रिफंड बाजार की वास्तविक स्थिति से जुड़ जाता है, जो निवेशकों के हित में है। पारदर्शिता बढ़ाने के लिए IRDAI ने कंपनियों को बाध्य किया है कि पॉलिसी बिक्री के समय ही ग्राहक को स्पष्ट रूप से बताया जाए कि विभिन्न समय पर सरेंडर करने पर कितनी राशि मिलेगी। LIC जैसी कंपनियों ने भी सरेंडर कैलकुलेटर ऑनलाइन उपलब्ध कराया है, जहां पॉलिसी नंबर डालकर अनुमानित राशि चेक की जा सकती है।
पॉलिसीधारकों को क्या फायदा
ये बदलाव पॉलिसीधारकों को सशक्त बना रहे हैं। पहले मजबूरी में पॉलिसी बंद करने पर लोग हताश हो जाते थे, लेकिन अब बेहतर रिटर्न के साथ उनका विश्वास बहाल हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जीवन बीमा क्षेत्र में नए निवेशकों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी। हालांकि, पुरानी पॉलिसियों पर ये नियम लागू नहीं होते। यदि आप LIC पॉलिसी धारक हैं, तो सरेंडर से पहले फॉर्म 5074 भरकर ब्रांच में जमा करें और KYC पूरा रखें। पेड-अप या लोन जैसे विकल्पों पर भी विचार करें। कुल मिलाकर, IRDAI का यह कदम बीमा को और समावेशी बना रहा है।









