
देश में बढ़ते एलपीजी सिलेंडर के दामों से राहत पाने और कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘गोबरधन योजना’ यानी बायोगैस कार्यक्रम तेजी से लागू हो रहा है। इस योजना के तहत अब हर घर अपने गीले कचरे और पशुओं के गोबर से रसोई गैस तैयार कर सकता है और सरकार सीधे बैंक खाते में 9,800 से 14,350 रुपये तक की सब्सिडी दे रही है। विशेष रूप से एससी/एसटी वर्ग और पहाड़ी इलाकों के लिए यह राशि और भी अधिक हो सकती है।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा संचालित इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना और जैविक कचरे का वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित करना है। बायोगैस प्लांट लगवाने वाले परिवारों को न केवल मुफ्त गैस मिलती है, बल्कि गैस उत्पादन के बाद बचा स्लरी (अवशेष) खेती के लिए बेहतरीन जैविक खाद के रूप में काम आता है।
कितनी मिलेगी सब्सिडी?
योजना के तहत सब्सिडी की राशि प्लांट की क्षमता पर निर्भर करती है। एक क्यूबिक मीटर क्षमता वाले छोटे प्लांट पर 9,800 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाती है, जबकि 2 से 25 क्यूबिक मीटर वाले मध्यम आकार के प्लांट पर 14,350 रुपये तक की सब्सिडी मिलती है। अनुसूचित जाति/जनजाति और पहाड़ी क्षेत्रों के आवेदकों को अतिरिक्त लाभ दिए जाते हैं, जिससे उनकी लागत और कम हो जाती है।
किन दस्तावेजों की होगी जरूरत?
आवेदन करने से पहले आवेदक के पास आधार कार्ड, बैंक खाता पासबुक (सब्सिडी राशि प्राप्त करने के लिए), जमीन के कागजात (जहां प्लांट स्थापित किया जाना है), पासपोर्ट साइज फोटो और सक्रिय मोबाइल नंबर होना अनिवार्य है। सभी दस्तावेजों की स्कैन कॉपी ऑनलाइन अपलोड करनी होती है।
ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया
सबसे पहले आधिकारिक पोर्टल biogas.mnre.gov.in पर जाएं। होमपेज पर ‘Apply for Biogas’ या ‘Registration’ विकल्प पर क्लिक करके पंजीकरण करें। इसके बाद व्यक्तिगत विवरण, राज्य, जिला और गांव की जानकारी भरें। सभी आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने के बाद फॉर्म को ध्यानपूर्वक जांचें और फाइनल सबमिट कर दें। आवेदन जमा होने के बाद विभाग के अधिकारी साइट का निरीक्षण करने आपके घर आएंगे। प्लांट स्थापित होने और सत्यापन पूरा होने के बाद सब्सिडी राशि सीधे आपके बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाएगी।
बायोगैस के प्रमुख फायदे
इस योजना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि परिवारों को एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता कम हो जाती है, जिससे सालाना हजारों रुपये की बचत होती है। साथ ही, घर और पशुओं के कचरे का वैज्ञानिक निपटान होने से पर्यावरण स्वच्छ रहता है और गंदगी नहीं फैलती। बचा हुआ स्लरी खेतों में डालने से फसल उत्पादन भी बढ़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह योजना न केवल आर्थिक बचत का जरिया है, बल्कि स्वच्छ भारत अभियान और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इच्छुक आवेदक अपने निकटतम कृषि विभाग कार्यालय या मान्यता प्राप्त बायोगैस वेंडर से भी संपर्क कर विस्तृत जानकारी ले सकते हैं।









