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नाइट शिफ्ट करने वाले सावधान! शरीर को अंदर से खोखला कर रही हैं ये 5 बीमारियां, आज ही संभलें

नाइट शिफ्ट हमारे प्राकृतिक स्लीप साइकल को तोड़कर दिमाग, दिल, मेटाबॉलिज्म, पाचन तंत्र और इम्यूनिटी पर सीधा हमला करती है। लगातार रात में काम करने से क्रॉनिक थकान, तनाव, मोटापा, डायबिटीज, हार्ट डिज़ीज, पाचन गड़बड़ी और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, इसलिए नाइट शिफ्ट वालों को लाइफस्टाइल मैनेजमेंट पर खास ध्यान देना जरूरी है।

By Pinki Negi

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आज की कॉर्पोरेट और सर्विस इंडस्ट्री में नाइट शिफ्ट अब मजबूरी से बढ़कर सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन इसकी कीमत कई लोग अपनी सेहत से चुका रहे हैं। लगातार रात में जागना, दिन में अधूरी नींद लेना और अनियमित खान‑पान हमारे स्लीप साइकल को तोड़ देता है, जिससे दिमाग, हार्मोन, दिल, मेटाबॉलिज्म और पाचन तंत्र सब पर असर पड़ने लगता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सालों तक नाइट शिफ्ट करने वाले कर्मचारियों में थकान, तनाव, मोटापा, डायबिटीज और हार्ट डिजीज का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में काफी अधिक देखा जाता है।

थकान जो कभी खत्म नहीं होती

इंसानी शरीर स्वाभाविक रूप से दिन में सक्रिय और रात में आराम के लिए बना है, जिसे सर्कैडियन रिद्म यानी बॉडी क्लॉक कहा जाता है। जब लोग लगातार इस घड़ी के उलट चलने लगते हैं, तो सबसे पहले असर दिखता है लगातार रहने वाली थकान के रूप में। नाइट शिफ्ट के बाद दिन में सोने की कोशिश के बावजूद कई बार पूरी, गहरी नींद नहीं हो पाती, क्योंकि बाहर रोशनी, घर का माहौल, शोर और पारिवारिक जिम्मेदारियां दिमाग को पूरी तरह “शटडाउन” नहीं होने देतीं। नतीजा यह कि शरीर हर वक्त भारीपन, कमजोरी और एनर्जी की कमी महसूस करता है, जिसे लोग अक्सर “क्रॉनिक फटीग” के रूप में बताते हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यह थकान सिर्फ आराम की कमी नहीं, बल्कि आने वाली गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत भी हो सकती है।

दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा वार

नींद पूरी न होना दिमाग के लिए सबसे बड़ा झटका साबित होता है। नाइट शिफ्ट करने वाले कई कर्मचारी चिड़चिड़ापन, ध्यान न लगना, हल्की भूल‑चूक, हेडेक और मूड स्विंग जैसी परेशानियों की शिकायत करते हैं। हालिया रिपोर्ट्स और स्टडीज़ बताती हैं कि जिन लोगों की नींद का पैटर्न लगातार बिगड़ा हुआ रहता है, उनमें एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा ज्यादा पाया गया है। सर्कैडियन रिद्म गड़बड़ने पर ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर और हार्मोन का बैलेंस प्रभावित हो जाता है, जिससे स्ट्रेस लेवल बढ़ता है और मानसिक स्वास्थ्य पर लंबी अवधि का असर पड़ सकता है।

डॉक्टरों का मानना है कि ऐसे लोग अक्सर खुद भी नहीं समझ पाते कि उनकी चिड़चिड़ाहट या निराशा का असली कारण खराब नींद और उलटा रूटीन है, और वे इसे सामान्य तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

मेटाबॉलिज्म, मोटापा और दिल की बीमारी का बढ़ता खतरा

रात में काम करने का सीधा असर शरीर के मेटाबॉलिज्म पर भी देखा जा रहा है। नाइट शिफ्ट में लोग अक्सर देर रात तक जागते हुए अनहेल्दी स्नैक्स, तला‑भुना खाना, मीठी चीजें और ज्यादा कैफीन का सेवन करते हैं ताकि जागे रह सकें। इससे बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने, वजन बढ़ने और पेट के आसपास चर्बी जमने का खतरा बढ़ जाता है, जो आगे चलकर मोटापा, टाइप‑2 डायबिटीज और हार्ट डिजीज की जमीन तैयार करता है।

कई अध्ययनों में पाया गया है कि नाइट शिफ्ट पैटर्न वाले कर्मचारियों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम – यानी मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, हाई शुगर और खराब लिपिड प्रोफाइल- ज्यादा देखे जाते हैं, जो दिल की बीमारी के प्रमुख जोखिम कारक हैं। कुछ रिसर्च में तो इस्केमिक हार्ट डिजीज का रिस्क नाइट शिफ्ट वर्कर्स में 40 प्रतिशत तक ज्यादा होने की बात तक सामने आई है।

पाचन तंत्र और इम्यूनिटी पर गहरा असर

रात में काम और अनियमित टाइम पर खाना सीधे पाचन तंत्र को प्रभावित करता है। जिस समय पेट और आंतों को आराम चाहिए, उस समय अक्सर लोग भारी भोजन, जंक फूड या बार‑बार स्नैकिंग कर लेते हैं। इससे गैस, एसिडिटी, पेट दर्द, कब्ज और इरिटेबल बाउल सिंड्रोम जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नाइट शिफ्ट करने वाले 20 से 75 प्रतिशत तक कर्मचारी किसी न किसी तरह की गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल प्रॉब्लम से जूझते हैं।

इम्यूनिटी पर भी इसका असर साफ दिखता है। जब शरीर को रोजाना पर्याप्त, गहरी नींद नहीं मिलती, तो इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ने लगता है और बॉडी की रोगों से लड़ने की क्षमता घट जाती है। ऐसे लोग मामूली संक्रमण, सर्दी‑जुकाम या वायरल से भी जल्दी प्रभावित हो सकते हैं और रिकवरी में ज्यादा समय लग सकता है।

क्या है बचाव का रास्ता?

विशेषज्ञ मानते हैं कि हर कोई अपनी नौकरी तुरंत बदल नहीं सकता, लेकिन जागरूक होकर नुकसान कम जरूर कर सकता है। नाइट शिफ्ट करने वालों के लिए दिन में कम से कम 7-8 घंटे की क्वालिटी नींद, अंधेरे और शांत कमरे में सोना, कैफीन और जंक फूड से दूरी, हल्का‑फुल्का और समय पर खाना और हफ्ते में नियमित एक्सरसाइज बेहद जरूरी है। समय‑समय पर ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल और अन्य हेल्थ पैरामीटर की जांच कराना भी जरूरी है, ताकि किसी बीमारी का शुरुआती स्टेज में ही पता लगाकर उसे कंट्रोल किया जा सके।

डॉक्टर साफ कहते हैं – अगर आप नाइट शिफ्ट कर रहे हैं, तो इसे केवल नौकरी नहीं, बल्कि हेल्थ मैनेजमेंट प्रोजेक्ट की तरह लें, वरना धीरे‑धीरे शरीर अंदर से खोखला हो सकता है।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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