
इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र महीने रमजान का आगाज हो चुका है। सऊदी अरब में चांद दिखने के साथ ही 18 फरवरी से रोजे रखने की शुरुआत हो गई है। पूरे एक महीने तक चलने वाले इस पाक महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग अल्लाह की इबादत करते हैं और रोजा (व्रत) रखते हैं।
रमजान का महीना पूरा होने के ठीक बाद खुशियों का त्योहार ईद-उल-फितर मनाया जाता है। चूंकि सऊदी अरब में रमजान शुरू हो चुके हैं, इसलिए ठीक एक महीने बाद वहां ईद मनाई जाएगी, जबकि भारत में चांद के दीदार के अनुसार इसकी तारीख तय होगी।
मीठी ईद और बकरीद का महत्व
मुस्लिम समुदाय के लिए साल में दो बार ईद का जश्न मनाया जाता है, जो आस्था और भाईचारे का प्रतीक है। पहली ईद-उल-फितर, जिसे हम ‘मीठी ईद’ भी कहते हैं, रमजान के पाक महीने के कठिन उपवासों (रोजों) के समापन पर मनाई जाती है। वहीं दूसरी ईद-उल-अजहा यानी बकरीद है, जो कुर्बानी के त्योहार के रूप में जानी जाती है।
इन दोनों ही त्योहारों की सटीक तारीख चांद के दिखने पर निर्भर करती है। फिलहाल, रमजान का महीना शुरू हो चुका है और दुनिया भर के मुसलमान अब मीठी ईद के दीदार का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जो खुशियों और अल्लाह के शुक्राने का दिन होता है।
कब दिखेगा चांद? जानें 19 या 20 मार्च की सटीक तारीख
ईद-उल-फितर की तारीख पूरी तरह से चांद के दीदार पर टिकी होती है। नियमों के अनुसार, 29वें रोजे की शाम को अगर चांद नजर आता है, तो उसके अगले दिन ईद मनाई जाती है। साल 2026 के कैलेंडर के हिसाब से, यदि 18 मार्च की शाम को चांद दिखता है, तो ईद 19 मार्च को होगी। वहीं, अगर चांद एक दिन बाद यानी 19 मार्च को दिखाई देता है, तो ईद 20 मार्च को मनाई जाएगी। हालांकि, सटीक तारीख का ऐलान चांद दिखने के बाद ही उलेमाओं और हिलाल कमेटियों द्वारा किया जाएगा।
ईद-उल-फितर का महत्व
ईद-उल-फितर का त्योहार केवल पकवानों का ही नहीं, बल्कि अल्लाह के प्रति आभार व्यक्त करने और आपसी प्रेम बढ़ाने का पवित्र अवसर है। रमजान के पूरे महीने रोजे रखने की शक्ति देने के लिए मुसलमान इस दिन खुदा का शुक्रिया अदा करते हैं।
लोग नए कपड़े पहनकर ईदगाहों में विशेष नमाज अदा करते हैं और एक-दूसरे को गले लगाकर ‘ईद मुबारक’ कहते हैं। यह दिन दान (जकात और फितरा) के माध्यम से जरूरतमंदों की मदद करने और घरों में सेंवई व बिरयानी जैसे शाही पकवानों के साथ खुशियां बांटने का संदेश देता है।
ईद-उल-फितर की मुख्य विशेषताएं
- अल्लाह का शुक्र: 30 दिनों के कठिन रोजों को सफलतापूर्वक पूरा करने की खुशी।
- दान और उदारता: गरीबों और जरूरतमंदों को दान देकर खुशियों में शामिल करना।
- पारंपरिक पकवान: मीठी सेंवई, शीर-खुरमा और लजीज बिरयानी का खास महत्व।
- सामाजिक एकता: आपसी गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलना।









