
हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के भाई प्रतीक यादव द्वारा अपनी पत्नी अपर्णा यादव से तलाक लेने की खबरों ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है। इस घटनाक्रम के बाद आम लोगों के मन में यह सवाल है कि भारत में एक पति किन कानूनी आधारों पर तलाक की मांग कर सकता है। भारतीय कानून (हिंदू विवाह अधिनियम) के तहत क्रूरता (Cruelty), बिना बताए छोड़ देना (Desertion), व्यभिचार (Adultery), या मानसिक स्वास्थ्य जैसे ठोस कारणों के आधार पर ही कोई व्यक्ति कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल कर सकता है। बिना ठोस कानूनी आधार और प्रमाण के किसी भी वैवाहिक रिश्ते को खत्म करना संभव नहीं होता है।
पति-पत्नी के समान कानूनी अधिकार
शादी दो लोगों के साथ-साथ दो परिवारों का भी जुड़ाव है, जिसमें दोनों की बराबर की जिम्मेदारी होती है। अक्सर लोगों को लगता है कि कानून सिर्फ महिलाओं का पक्ष लेता है, लेकिन भारतीय कानून पुरुषों को भी तलाक और गुजारा भत्ता (Maintenance) मांगने का समान अधिकार देता है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार, पति और पत्नी दोनों ही जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे से कानूनी सहायता और भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। आज के समय में कानून लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता, बल्कि दोनों के अधिकारों की रक्षा करता है।
क्रूरता के आधार पर पति को तलाक का अधिकार
भारतीय कानून के अनुसार, केवल पत्नी ही नहीं बल्कि पति भी क्रूरता को आधार बनाकर तलाक की मांग कर सकता है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) के तहत, यदि पत्नी का व्यवहार पति के प्रति शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक रूप से हिंसक या अपमानजनक है, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। अगर पति यह साबित कर दे कि पत्नी के दुर्व्यवहार के कारण उसका साथ रहना मुश्किल और असहनीय हो गया है, तो कानून उसे वैवाहिक बंधन से मुक्त होने का पूरा अधिकार देता है। आज की न्याय व्यवस्था दोनों पक्षों को निष्पक्ष होकर सुनती है।
व्यभिचार (Adultery)
अब भारतीय कानून में व्यभिचार को केवल पुरुषों से जोड़कर नहीं देखा जाता। सर्वोच्च न्यायालय के नए फैसलों के बाद, यदि पत्नी का अपनी शादी के बाहर किसी अन्य व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध (Extra-marital affair) है, तो पति इसे आधार बनाकर तलाक की याचिका दायर कर सकता है। हालांकि अब यह कोई आपराधिक जुर्म नहीं है, लेकिन वैवाहिक रिश्तों में इसे धोखे के तौर पर देखा जाता है और यह पति को कानूनी रूप से अलग होने का एक ठोस आधार प्रदान करता है।
परित्याग (बिना बताए अलग रहना)
यदि पत्नी बिना किसी ठोस वजह के और पति की सहमति के बिना घर छोड़कर चली जाती है, तो इसे ‘परित्याग’ (Desertion) माना जाता है। कानून के अनुसार, अगर पत्नी लगातार दो साल या उससे अधिक समय तक पति से अलग रहती है और वापस आने की उसकी कोई मंशा नहीं दिखती, तो पति इस आधार पर कोर्ट में तलाक की अर्जी दे सकता है। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को बिना वजह अकेलेपन या अनिश्चितता के रिश्ते में न रहना पड़े।
धर्म परिवर्तन (Conversion)
यदि पत्नी शादी के बाद अपना धर्म बदल लेती है और इस कारण पति के साथ वैवाहिक जीवन बिताना असंभव हो जाता है, तो यह तलाक का एक वैध आधार है।
मानसिक विकार (Mental Disorder)
यदि पत्नी किसी ऐसी गंभीर मानसिक बीमारी (जैसे सिज़ोफ्रेनिया) से पीड़ित है, जिससे वह अपनी जिम्मेदारियां निभाने में असमर्थ हो और पति का उसके साथ रहना असुरक्षित या कठिन हो जाए।
संक्रामक रोग (Venereal Disease)
यदि पत्नी किसी संक्रामक यौन रोग (जैसे HIV या सिफलिस) से ग्रसित है, तो पति स्वास्थ्य और सुरक्षा के आधार पर तलाक मांग सकता है।
संसार का त्याग (Renunciation)
यदि पत्नी सांसारिक सुख-सुविधाओं को छोड़कर किसी धार्मिक संस्था में शामिल हो जाती है या संन्यास ले लेती है, तो पति कानूनी रूप से अलग हो सकता है।
मृत्यु की धारणा (Presumption of Death)
यदि पत्नी लगातार 7 वर्षों से लापता है और उसके जीवित होने की कोई जानकारी नहीं है, तो कानून उसे मृत मान लेता है और पति को दूसरी शुरुआत करने के लिए तलाक की अनुमति देता है।
तलाक की कानूनी प्रक्रिया और तरीके
भारत में तलाक लेने के मुख्य रूप से दो तरीके हैं: विवादित तलाक (Contested Divorce) और आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce)। यदि पत्नी तलाक के लिए तैयार न हो, तो पति को क्रूरता या व्यभिचार जैसे कानूनी आधारों पर याचिका दायर करनी पड़ती है और सबूत के तौर पर ऑडियो, वीडियो या अन्य दस्तावेज अदालत में पेश करने होते हैं।
इसके विपरीत, यदि दोनों पक्ष अलग होने के लिए राजी हैं, तो वे आपसी सहमति से आवेदन कर सकते हैं, बशर्ते उनकी शादी को एक साल पूरा हो चुका हो। आपसी सहमति के मामलों में अदालत अक्सर 6 से 18 महीने का समय सुलह की कोशिशों के लिए देती है ताकि जल्दबाजी में रिश्ता न टूटे।
तलाक के बाद भरण-पोषण और लगने वाला समय
तलाक के मामलों में भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है; यदि पति आर्थिक रूप से असमर्थ है, तो वह भी पत्नी से गुजारा भत्ता की मांग कर सकता है। अदालत दोनों पक्षों की आय, संपत्ति और जीवनशैली की गहन जाँच करने के बाद ही यह तय करती है कि किसे सहायता की आवश्यकता है।
जहाँ तक समय की बात है, आपसी सहमति से होने वाला तलाक आमतौर पर 6 से 18 महीने में पूरा हो जाता है, जबकि विवादित तलाक की कानूनी प्रक्रिया लंबी खींच सकती है और इसमें 7 से 10 साल तक का समय लग सकता है।









