
झारखंड हाईकोर्ट ने बुजुर्गों के सम्मान में एक अहम निर्णय सुनाते हुए कहा है कि किसी भी माता-पिता को उनके अपने ही घर में प्रताड़ना सहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यदि बच्चों और माता-पिता के बीच अनबन है और वे साथ नहीं रह सकते, तो घर पर रहने का प्राथमिक अधिकार बुजुर्गों का ही होगा। जस्टिस राजेश कुमार की बेंच ने रामगढ़ के एक मामले की सुनवाई करते हुए जोर दिया कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान सबसे ऊपर है, और कानून उन्हें शांति से अपने घर में रहने का पूरा अधिकार देता है।
रामगढ़ के बुजुर्ग दंपति की जीत
यह पूरा मामला रामगढ़ के एक 75 वर्षीय बुजुर्ग और उनकी पत्नी से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी जीवनभर की मेहनत की कमाई से अपना घर बनाया था। इस दंपति का दुखद आरोप था कि उनके अपने ही बेटा और बहू उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे, जिसके कारण घर में उनका रहना दूभर हो गया था।
शांतिपूर्ण जीवन जीने के अधिकार के लिए, उन्होंने ‘वरिष्ठ नागरिक कानून’ (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act) के तहत एसडीएम (SDM) कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह मामला यह साबित करता है कि बुजुर्गों को अपने ही घर में बेगाना नहीं बनाया जा सकता और कानून उनकी रक्षा के लिए सदैव खड़ा है।
कोर्ट ने बेटे-बहू के खिलाफ सुनाया फैसला
रामगढ़ के एक बुजुर्ग दंपति ने अपनी मेहनत से बने घर में बेटे-बहू की प्रताड़ना के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। 2022 में एसडीएम ने उन्हें घर खाली करने को कहा, लेकिन उपायुक्त (DC) ने इस आदेश को बदल दिया। मामला जब हाईकोर्ट पहुँचा, तो कोर्ट ने बुजुर्गों के पक्ष में फैसला देते हुए साफ कर दिया कि शांति से रहने का पहला अधिकार माता-पिता का ही है।
बुजुर्गों की मेहनत की कमाई पर सिर्फ उनका हक
झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि मकान बुजुर्गों की स्वयं अर्जित संपत्ति है, इसलिए वहां रहने का पहला अधिकार उन्हीं का है। अदालत ने माना कि जब बच्चों के साथ गहरे मतभेदों के कारण शांति से रहना मुमकिन न हो, तो कानून बुजुर्गों की ढाल बनता है। कोर्ट के अनुसार, जिन्होंने पूरी उम्र मेहनत कर अपना आशियाना बनाया, उन्हें जीवन के अंतिम पड़ाव में सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल मिलना ही चाहिए।
अधिकार चाहिए तो कर्तव्य भी निभाएं, हाईकोर्ट की बच्चों को नसीहत
झारखंड हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून बुजुर्गों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए ही बना है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यदि संतान माता-पिता की संपत्ति में अधिकार चाहती है, तो उन्हें अपने कर्तव्य भी निभाने होंगे। कोर्ट ने उपायुक्त के आदेश को रद्द करते हुए बुजुर्ग दंपति को राहत दी और स्पष्ट किया कि बुजुर्गों को उनके ही घर में असुरक्षित छोड़ना कानून की मूल भावना के खिलाफ है।









