
सरकार ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसके तहत अब राष्ट्रगान के तुरंत बाद वंदे मातरम के 6 छंदों का गायन किया जाएगा। नए नियमों के अनुसार, इस 3 मिनट 10 सेकंड के गीत के दौरान सभी उपस्थित लोगों को सम्मान में खड़ा होना अनिवार्य होगा। यदि किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों का आयोजन होना है, तो प्रोटोकॉल के मुताबिक पहले वंदे मातरम गाया जाएगा और उसके बाद राष्ट्रगान होगा। इन नियमों का उद्देश्य राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और एकरूपता बनाए रखना है।
आनंदमठ से लेकर राष्ट्र गीत बनने तक का सफर
भारत के गौरवशाली राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की यात्रा बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ (1882) से शुरू हुई। इस गीत को सबसे पहले 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वर दिया था। आजादी की लड़ाई में 7 अगस्त 1905 को यह पहली बार एक शक्तिशाली राजनीतिक नारे के रूप में गूँजा और क्रांतिकारियों का प्रेरणा स्रोत बना। अंततः, देश के सम्मान को देखते हुए 1950 में संविधान सभा ने इसे आधिकारिक तौर पर भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया।
सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ हुआ अनिवार्य
सरकार ने स्पष्ट किया है कि अब सभी प्रमुख आधिकारिक आयोजनों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य होगा। नए नियमों के अनुसार, ध्वजारोहण के समय, पद्म पुरस्कार समारोहों और ऐसे कार्यक्रमों में जहाँ राष्ट्रपति या राज्यपाल शामिल हों, उनके आगमन से पहले और प्रस्थान के बाद इस राष्ट्रीय गीत को गाया जाएगा। सरकार ने उन कार्यक्रमों की एक विस्तृत सूची भी जारी की है जिनमें इस प्रोटोकॉल का पालन करना जरूरी है। इन नियमों का उद्देश्य सरकारी गरिमा वाले समारोहों में राष्ट्रीय गीत को उचित सम्मान और स्थान देना है।
जब ब्रिटिश सरकार को लगा वंदे मातरम से डर
PIB की एक रिपोर्ट के अनुसार, आजादी की लड़ाई के दौरान वंदे मातरम की बढ़ती लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार बुरी तरह घबरा गई थी। इस गीत के प्रभाव को कुचलने के लिए तत्कालीन पूर्वी बंगाल की सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में इसे गाने या इसके नारे लगाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। इतना ही नहीं, ब्रिटिश हुकूमत ने उन शिक्षण संस्थानों की मान्यता रद्द करने की चेतावनी दी थी जहाँ वंदे मातरम गाया जाता था। जो छात्र इन आंदोलनों का हिस्सा बनते थे, उन्हें सरकारी नौकरी से वंचित करने की धमकी भी दी जाती थी।
वंदे मातरम के लिए दी गई कुर्बानियां
आजादी की लड़ाई के दौरान ‘वंदे मातरम’ गाना ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत माना जाता था। 1905 में बंगाल के रंगपुर में 200 छात्रों पर सिर्फ इसलिए जुर्माना लगाया गया क्योंकि उन्होंने यह गीत गाया था। दमन का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; 1908 में बेलगाम में लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी के विरोध में यह गीत गाने वाले लड़कों को पुलिस ने बेरहमी से पीटा और गिरफ्तार किया। इन घटनाओं से पता चलता है कि कैसे अंग्रेजों ने इस राष्ट्रीय उद्घोष को दबाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन जनता ने पुलिस की लाठियां खाकर भी ‘वंदे मातरम’ का गान जारी रखा।









