
केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई शिक्षक छात्र को अनुशासन में लाने के लिए उचित और सीमित मात्रा में छड़ी का उपयोग करता है, तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा। जस्टिस सी. प्रथीप कुमार ने ‘सिबिन एसवी बनाम केरल राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया। यह मामला 2025 की एक घटना से जुड़ा था, जिसमें एक शिक्षक पर छात्र को पीटने का आरोप लगा था। कोर्ट ने पाया कि छात्र को कोई बाहरी चोट नहीं आई थी और शिक्षक का उद्देश्य केवल अनुशासन बनाए रखना था, न कि छात्र को नुकसान पहुँचाना।
शिक्षक को मिला ‘अनुशासन का अधिकार’
एक मामले में छात्र को सजा देने पर शिक्षक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और किशोर न्याय अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। शिक्षक ने इस कार्यवाही को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि जब माता-पिता अपने बच्चे को स्कूल भेजते हैं, तो वे शिक्षक को उसे अनुशासित करने का अधिकार भी देते हैं। कोर्ट ने माना कि शिक्षक का उद्देश्य बच्चे को नुकसान पहुँचाना नहीं बल्कि सुधारना था, इसलिए इसे अपराध नहीं माना जा सकता।
छड़ी ‘खतरनाक हथियार’ नहीं, सुधार के लिए दी गई सजा जायज
केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि एक सामान्य छड़ी को भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत ‘खतरनाक हथियार’ नहीं माना जा सकता। जज ने कहा कि यदि शिक्षक का उद्देश्य बच्चे को चोट पहुँचाना नहीं बल्कि उसके चरित्र में सुधार करना है, तो इसे आपराधिक अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। अदालत ने जोर दिया कि शिक्षकों की भूमिका विशेष होती है और सद्भावना (Bona fide) के साथ किया गया न्यूनतम बल प्रयोग कानूनन स्वीकार्य है, बशर्ते उसमें कोई क्रूरता या दुर्भावना न छिपी हो।
शिक्षक पर लगे आरोप हुए खारिज
केरल हाईकोर्ट ने पाया कि शिक्षक के खिलाफ लगाए गए आरोप बेबुनियाद थे, क्योंकि उनका उद्देश्य छात्र को प्रताड़ित करना नहीं बल्कि केवल अनुशासित करना था। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में केस चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, क्योंकि शिक्षक ने छात्र को जानबूझकर चोट पहुँचाने के लिए कोई क्रूरता नहीं की थी। इसी के साथ अदालत ने तिरुवनंतपुरम की सत्र अदालत में लंबित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। यह फैसला उन शिक्षकों के लिए बड़ी राहत है, जिन्हें अक्सर सामान्य अनुशासन बनाए रखने पर कानूनी मुकदमों का सामना करना पड़ता है।









