
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि अगर कोई व्यक्ति अपना फ्लैट किराये पर देता है, तो भी वह ‘उपभोक्ता’ (Consumer) ही कहलाएगा। अक्सर बिल्डर यह तर्क देते थे कि किराये पर घर देना एक व्यापारिक काम (Commercial Purpose) है, इसलिए खरीदार उपभोक्ता अदालत में शिकायत नहीं कर सकता। लेकिन अदालत ने कहा कि सिर्फ किराये पर देने भर से कोई व्यक्ति उपभोक्ता की श्रेणी से बाहर नहीं हो जाता।
अब अगर बिल्डर को किसी खरीदार को उपभोक्ता मानने से मना करना है, तो उसे यह ठोस सबूत देना होगा कि फ्लैट पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ व्यापार के मकसद से खरीदा गया था। इस फैसले से उन लाखों लोगों को मजबूती मिली है जो निवेश या अतिरिक्त कमाई के लिए घर खरीदते हैं।
घर किराये पर देने वाला व्यक्ति भी ‘उपभोक्ता’, बिल्डर की दलील खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उपभोक्ता कानून के तहत ‘उपभोक्ता’ वही है जो कीमत चुकाकर सामान या सेवा लेता है। हालांकि, जो लोग दोबारा बेचने (Resale) या पूरी तरह बिजनेस के लिए संपत्ति खरीदते हैं, वे इस दायरे में नहीं आते। लेकिन कोर्ट ने साफ कर दिया कि सिर्फ फ्लैट को किराये या पट्टे (Lease) पर दे देने का मतलब यह नहीं है कि खरीदार कोई ‘व्यापारिक गतिविधि’ कर रहा है।
अदालत के अनुसार, जब तक यह साबित न हो जाए कि फ्लैट खरीदने का मुख्य उद्देश्य ही व्यापार करना था, तब तक खरीदार को उपभोक्ता ही माना जाएगा और उसे उपभोक्ता अदालत में शिकायत करने का पूरा हक होगा।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने विनीत बहरी बनाम बिल्डर मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया है। दरअसल, राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) ने पहले यह कहकर शिकायत खारिज कर दी थी कि फ्लैट को किराये पर देना एक ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ (Commercial Purpose) है, इसलिए खरीदार उपभोक्ता नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ क्या है, यह हर मामले के तथ्यों को देखकर तय होना चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ घर को पट्टे या किराये पर देने से कोई खरीदार उपभोक्ता की श्रेणी से बाहर नहीं हो जाता। इस फैसले ने उन लोगों के लिए इंसाफ का रास्ता खोल दिया है जिन्हें बिल्डर तकनीकी पेचों में फंसाकर उपभोक्ता अदालतों से दूर रखते थे।
फ्लैट किराये पर देने के बावजूद बिल्डर को देना होगा मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने उन लाखों मकान खरीदारों की चिंता दूर कर दी है जो एक्स्ट्रा इनकम के लिए अपना फ्लैट किराये पर देते हैं। दरअसल, विनीत बहरी मामले में बिल्डर ने यह दलील दी थी कि चूंकि फ्लैट किराये पर चढ़ाया गया है, इसलिए यह एक ‘बिज़नेस’ है और खरीदार उपभोक्ता कानून के तहत मुआवजे का हकदार नहीं है।
बिल्डर की इस चालाकी को नाकाम करते हुए शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया कि किराये पर घर देना खरीदार के उपभोक्ता होने के अधिकार को खत्म नहीं करता। अब मकान में किसी भी तरह की कमी या पजेशन में देरी होने पर, किराये पर घर देने वाले मालिक भी बिल्डर के खिलाफ उपभोक्ता अदालत में मजबूती से अपना हक मांग सकेंगे।









