
सुप्रीम कोर्ट में आज मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई, जिसमें चुनाव आयोग से तमिलनाडु में किए गए मतदाता सूची पुनरीक्षण (Revision) पर जवाब मांगा गया है। डीएमके नेता आरएस भारती की याचिका पर सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने ‘तार्किक विसंगति’ (Logical Discrepancy) वाली सूची को सार्वजनिक करने के निर्देश पर विचार किया।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की दलीलों के बाद, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सहमति जताते हुए कहा कि जिस तरह पश्चिम बंगाल में पारदर्शिता के लिए मतदाता सूची से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक करने के आदेश दिए गए थे, वही नियम तमिलनाडु में भी अपनाए जाने चाहिए।
नागरिकता पर चुनाव आयोग का हक नहीं
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का संवैधानिक अधिकार केवल केंद्र सरकार को है, चुनाव आयोग को नहीं।
सिब्बल ने तर्क दिया कि किसी भी मतदाता का नाम महज एक प्रशासनिक आदेश से नहीं हटाया जा सकता, क्योंकि यह उसकी नागरिकता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला है। इस बहस के बीच जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग की असीमित शक्तियों और उनके दायरे पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जिससे यह मामला संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की ओर मुड़ गया है।
कपिल सिब्बल ने पूछा—कितना पारदर्शी है चुनाव आयोग का नियंत्रण?
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने संविधान के अनुच्छेद 324 और 326 का हवाला देते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की मांग की। उन्होंने अदालत में स्पष्ट किया कि भले ही चुनाव प्रक्रिया पर आयोग का पूर्ण नियंत्रण है, लेकिन यह नियंत्रण मनमाना नहीं बल्कि नियमों और ठोस तर्कों पर आधारित होना चाहिए। सिब्बल के अनुसार, मतदाता सूची से नाम हटाना एक ‘प्रशासनिक कार्य’ है, और लोकतांत्रिक ढांचे में किसी भी प्रशासनिक निर्णय के पीछे एक स्पष्ट और वाजिब कारण होना अनिवार्य है ताकि नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा हो सके।
कपिल सिब्बल ने ‘फॉर्म 7’ और नियमों का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की दलीलों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- प्रक्रिया और पारदर्शिता: सिब्बल ने स्पष्ट किया कि उन्हें चुनाव आयोग की शक्तियों (अनुच्छेद 324) से आपत्ति नहीं है, बल्कि वे उस अपारदर्शी प्रक्रिया को चुनौती दे रहे हैं जिसके जरिए मतदाता सूची से नाम हटाए गए। उन्होंने मांग की कि हर प्रशासनिक फैसले का एक ठोस कानूनी आधार होना चाहिए।
- नागरिकता का अधिकार: उन्होंने तर्क दिया कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) के पास है। चुनाव आयोग के पास यह शक्ति नहीं है कि वह किसी नागरिक को ‘गैर-नागरिक’ घोषित कर उसका वोट देने का अधिकार छीन ले।
- फॉर्म 7 और सबूत का बोझ: सिब्बल ने कहा कि यदि किसी की नागरिकता या मतदाता पात्रता पर संदेह है, तो ‘फॉर्म 7’ की प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। नाम हटाने का अनुरोध करने वाले व्यक्ति को पुख्ता सबूत देने होंगे, न कि केवल सरकारी आदेश से किसी का नाम काटा जा सकता है।
जस्टिस बागची और कपिल सिब्बल के बीच तीखी कानूनी बहस
- नागरिकता बनाम मतदाता अधिकार: कपिल सिब्बल ने दलील दी कि नागरिकता केवल केंद्र सरकार तय कर सकती है, क्योंकि यह छीनी नहीं जा सकती। इस पर जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब नागरिकता खोना नहीं, बल्कि केवल वोट देने का अधिकार खोना होता है।
- सबूत का बोझ (Burden of Proof): सिब्बल ने ‘फॉर्म 7’ का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई किसी मतदाता का नाम हटाने की मांग करता है, तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी उस आवेदक की होनी चाहिए, न कि उस व्यक्ति की जिसका नाम काटा जा रहा है।
- अधिकारी की शक्ति पर सवाल: सिब्बल ने चिंता जताई कि क्या एक चुनाव पंजीकरण अधिकारी (ERO) को यह तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं, भले ही वह केवल वोटिंग के उद्देश्य से ही क्यों न हो।
वोटर आईडी ही नागरिकता का इकलौता सबूत
सुप्रीम कोर्ट में आज चुनाव आयोग की शक्तियों और नागरिकों के वोटिंग अधिकारों पर एक गंभीर संवैधानिक बहस हुई। जस्टिस बागची और वरिष्ठ वकीलों के बीच हुई इस चर्चा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- नागरिकता और वोटर आईडी: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि भारत में अधिकांश वयस्कों के लिए वोटर आईडी (ECI कार्ड) ही नागरिकता का एकमात्र व्यावहारिक प्रमाण है। ऐसे में मतदाता सूची से नाम हटाना केवल वोट देने का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि किसी की पहचान पर सवाल उठाना है।
- SIR प्रक्रिया और सबूत का बोझ: बिहार का उदाहरण देते हुए बताया गया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत 2003 की एक मनमानी ‘कट-ऑफ’ तारीख तय कर दी गई है। इससे उन लोगों पर भी अपनी पात्रता दोबारा साबित करने का बोझ डाल दिया गया है, जो वर्षों से मतदान कर रहे हैं।
- संवैधानिक अधिकार बनाम आयोग की शक्ति: शंकरनारायणन ने जोर दिया कि वोट देने का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने दलील दी कि चुनाव आयोग की मतदाता सूची तैयार करने की शक्ति नागरिकों के मौलिक अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के अधीन होनी चाहिए, न कि उनके ऊपर।
सुप्रीम कोर्ट में योगेंद्र यादव और शंकरनारायणन ने चुनाव आयोग की ‘SIR’ प्रक्रिया को बताया दोषपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट में आज चुनाव आयोग (ECI) की शक्तियों और मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर तीखी बहस हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के “पूर्ण अधिकारों” के दावे पर सवाल उठाए:
- संवैधानिक अधिकारों का हनन: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि यदि वोट देना एक संवैधानिक अधिकार है, तो बिना किसी कानूनी संशोधन या ठोस आधार के पुराने मतदाताओं का नाम सूची से हटाना असंवैधानिक है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RoPA) पहले से मौजूद है, तो चुनाव आयोग अनुच्छेद 324 के तहत असीमित शक्तियों का उपयोग कैसे कर सकता है?
- मतदाता अनुपात में गिरावट: याचिकाकर्ता योगेंद्र यादव ने कोर्ट को बताया कि चुनाव आयोग ने उनके द्वारा उठाए गए किसी भी तकनीकी तथ्य का खंडन नहीं किया है। उन्होंने दलील दी कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के कारण ‘निर्वाचन जनसंख्या अनुपात’ में भारी कमी आई है, जो मतदाता सूची के वैश्विक मानकों (पूर्णता, समानता और सटीकता) के खिलाफ है।
- डिजाइन में दोष: यादव ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में आ रही यह गिरावट महज एक इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके स्ट्रक्चरल डिजाइन में ही दोष है, जिसके कारण बड़ी संख्या में पात्र मतदाता सूची से बाहर हो रहे हैं।









