
राशन की दुकानों पर चावल की कालाबाजारी का खेल तो आप सबने देखा- सुना होगा। सस्ते में मिला चावल बाजार में महंगे दाम पर बिकता है, और गरीब कार्डधारक खाली हाथ लौटते हैं। लेकिन अब सरकार ने इसे रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है। आगरा और अलीगढ़ मंडल के जिलों में राशन वितरण का मानक बदल दिया गया है। अब हर यूनिट को तीन किलो गेहूं और दो किलो चावल मिलेगा। ये बदलाव फरवरी से लागू हो जाएगा। जिला पूर्ति अधिकारी ने सभी डीलरों को सख्त निर्देश जारी कर दिए हैं। आइए, इसकी पूरी कहानी समझते हैं।
कालाबाजारी का पुराना खेल, अब खत्म
सोचिए, हमारे इलाके में गेहूं की रोटी तो रोज की जरूरत है, लेकिन चावल? वो कम ही खाते हैं लोग। इसलिए राशन कार्ड पर मिला चावल बेच दिया जाता है। साइकिल या ई-रिक्शा वाले घूम-घूमकर कार्डधारकों से चावल इकट्ठा करते हैं, फिर आढ़तियों को सौंप देते हैं। वो सस्ते में खरीदकर बाजार में ऊंचे दाम पर बेचते हैं। आगरा, अलीगढ़ जैसे जिलों में ऐसे कई मामले पकड़े गए हैं। डीलरों पर भी शक की नजर रहती है, लेकिन असल समस्या खपत की है। लोग चावल ज्यादा नहीं लेते, तो बचे हुए का क्या करें? इसी समस्या ने सरकार की नींद उड़ा दी।
सरकार की समझदारी भरा फैसला
अब सरकार ने आखिरकार हकीकत को परखा। 14 जनवरी को अपर आयुक्त खाद्य एवं रसद विभाग ने आदेश जारी किया। इसमें आगरा, अलीगढ़, मेरठ और सहारनपुर मंडल के सभी जिलों के लिए नया नियम बताया गया। पहले प्रति यूनिट तीन किलो चावल मिलता था, जो दो किलो हो गया।
गेहूं पहले दो किलो का था, अब तीन किलो। अंत्योदय परिवारों के लिए तो और राहत है – पहले 21-21 किलो गेहूं-चावल, अब 21 किलो गेहूं और 14 किलो चावल। ये बदलाव इलाके की असल जरूरत के हिसाब से है। जहां चावल कम खाया जाता है, वहां उसे कम देकर गेहूं बढ़ा दिया। सही लगता है न?
फरवरी से नई शुरुआत, डीलर सतर्क
फरवरी के पहले हफ्ते से ये व्यवस्था शुरू हो जाएगी। जिला पूर्ति अधिकारी ने राशन डीलरों को चिट्ठी भेजी है – कोई चूक नहीं बर्दाश्त होगी। डीलरों को स्टॉक रजिस्टर सही रखना होगा, वितरण की पूरी जानकारी अपलोड करनी पड़ेगी। अगर कालाबाजारी पकड़ी गई, तो लाइसेंस कैंसल। ये निर्देश सिर्फ कागज पर नहीं, जमीनी स्तर पर लागू होंगे। अब कार्डधारक भी खुश होंगे, क्योंकि गेहूं ज्यादा मिलेगा जो उनकी रोजमर्रा की जरूरत है। चावल कम मिलने से बचे हुए का ब्लैक मार्केट खत्म हो जाएगा।
गरीबों को मिलेगी असली राहत
इस बदलाव से सबसे फायदा अंत्योदय और सामान्य कार्डधारकों को। एक परिवार में औसतन पांच यूनिट होते हैं, तो गेहूं 15 किलो और चावल 10 किलो मिलेगा। पहले चावल ज्यादा होने से बिक्री होती थी, अब बैलेंस हो गया। ग्रामीण इलाकों में जहां रोटी ही मुख्य भोजन है, ये परफेक्ट है। सरकार का ये कदम व्यावहारिक लगता है – ऊपर बैठे अफसरों ने जमीनी हकीकत सुनी। इससे न सिर्फ कालाबाजारी रुकेगी, बल्कि राशन सिस्टम पारदर्शी बनेगा। ई-पॉस मशीनों से ट्रैकिंग और मजबूत होगी।
आगे की चुनौतियां और उम्मीदें
हालांकि, चुनौतियां बाकी हैं। कुछ डीलर शिकायत कर सकते हैं कि चावल कम देने से कार्डधारक नाराज होंगे। लेकिन लॉन्ग टर्म में ये सही है। सरकार को अब जागरूकता अभियान चलाना चाहिए – गांव-गांव जाकर बताएं कि ये बदलाव क्यों जरूरी है। एनजीओ और स्थानीय नेता मदद कर सकते हैं। अगर ये मॉडल कामयाब रहा, तो पूरे यूपी में फैल सकता है। कुल मिलाकर, गरीबों के हित में ये सकारात्मक कदम है। कालाबाजारी के सौदागरों का खेल अब मुश्किल हो जाएगा।









