
भारत में टोल टैक्स की कमाई अब आसमान छू रही है। कल्पना कीजिए, आप हाईवे पर तेज रफ्तार से गाड़ी चला रहे हैं, FASTag स्कैन हो गया और बस, टोल चुक गया। लेकिन इसके पीछे की कहानी क्या है? सरकार के पास आने वाले दिनों में टोल से ऐसी कमाई होने वाली है जो रिकॉर्ड तोड़ देगी।
वित्त वर्ष 2026-27 में यह आंकड़ा पहली बार 1 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच सकता है। ये सुनने में तो बड़ा लगता है ना, लेकिन ये सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की बढ़ती इंफ्रास्ट्रक्चर की कहानी है। आइए, इसकी गहराई में उतरते हैं।
टोल वसूली कैसे होती है?
सोचिए, देशभर में राष्ट्रीय हाईवे और एक्सप्रेसवे पर सैकड़ों टोल प्लाजा खड़े हैं। हर बार जब आपकी गाड़ी इनसे गुजरती है, तो वाहन का प्रकार, तय दूरी और स्थानीय दरों के आधार पर टोल कट जाता है। अभी देश में 1000 से ज्यादा ऐसे प्लाजा हैं, और कई बड़े प्लाजा तो रोजाना करोड़ों रुपये जमा कर रहे हैं। कभी-कभी ट्रैफिक जाम में फंसकर लगता होगा कि ये प्लाजा क्यों हैं, लेकिन ये सब सड़कों को बेहतर बनाने के लिए ही तो हैं। ये सिस्टम इतना बड़ा हो चुका है कि छोटी-मोटी यात्रा से लेकर लॉन्ग ड्राइव तक, हर जगह इसका असर पड़ता है।
पिछले सालों की ग्रोथ की झलक
पिछले कुछ सालों में टोल कलेक्शन ने रफ्तार पकड़ ली है। FY24 में ये 64,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गया था, जो पहले के मुकाबले 35% की छलांग थी। FY25 में तो ये और ऊपर गया। क्यों? क्योंकि हाईवे का नेटवर्क फैल रहा है, गाड़ियां बढ़ रही हैं, और सबसे बड़ी बात – डिजिटल पेमेंट ने जिंदगी आसान कर दी। पहले नकद लाइनों में घंटों इंतजार, अब बस एक चिप से काम। ये आंकड़े बताते हैं कि टोल अब सरकार का मजबूत राजस्व स्तंभ बन चुका है, जो पहले कभी इतना नहीं था।
FASTag ने बदल दिया खेल
अब बात FASTag की। ये छोटी सी चिप ने टोल प्लाजा पर होने वाले ड्रामे को खत्म कर दिया। पहले नकद भुगतान से लाइनें लगी रहतीं, घूस-घपला भी होता। लेकिन अब 99% से ज्यादा वाहन FASTag से चलते हैं। और सुनिए, 1 अप्रैल 2026 से नकद भुगतान लगभग बंद हो जाएगा। इससे वसूली न सिर्फ तेज हुई, बल्कि पारदर्शी भी। कोई चोरी-छिपे नहीं हो पाती। डिजिटल सिस्टम की वजह से सरकार को रोजाना के आंकड़े तुरंत मिल जाते हैं, और ट्रैफिक फ्लो सुधर गया है। यात्री खुश, सरकार खुश – सबका फायदा।
इतनी कमाई का राज क्या है?
क्या सिर्फ मौजूदा प्लाजा से 1 लाख करोड़ आ जाएंगे? नहीं, बल्कि नए हाईवे, एक्सप्रेसवे और ब्रिज बन रहे हैं। आने वाले सालों में और प्लाजा सक्रिय होंगे। ऊपर से सरकार सैटेलाइट बेस्ड मल्टी लेन फ्री फ्लो (MLFF) सिस्टम ला रही है। इसमें कोई बूथ नहीं, बस सैटेलाइट से ट्रैकिंग हो जाएगी और टोल कट जाएगा। सोचिए, बिना रुके हाईवे पार करना – ये क्रांति लाएगा। ट्रैफिक बढ़ेगा, वसूली बढ़ेगी। ये सब मिलाकर FY27 का लक्ष्य हासिल हो जाएगा।
पैसा कहां जाता है?
अब बड़ा सवाल – ये अरबों रुपये सरकार की जेब में? नहीं भाई, ये सीधे खजाने में नहीं जाते। ज्यादातर रकम सड़कों के रखरखाव, नए पुलों, हाईवे विस्तार पर खर्च होती है। इससे सड़कें चमचमाती रहती हैं, लॉजिस्टिक्स सस्ता होता है, और व्यापार बढ़ता है। कभी-कभी कर्ज चुकाने या प्राइवेट ठेकेदारों को पेमेंट में भी जाता है। कुल मिलाकर, आपका टोल ही तो बेहतर सड़कें दे रहा है।
सरकार और प्राइवेट का पार्टनरशिप
टोल सिस्टम में सरकार अकेली नहीं। PPP मॉडल से प्राइवेट कंपनियां प्लाजा चलाती हैं, लेकिन नियम सरकार के। इससे सरकार को बिना ज्यादा खर्च के इंफ्रा प्रोजेक्ट पूरे हो जाते हैं। कंपनियां मुनाफा कमाती हैं, सरकार को फायदा। ये साझेदारी देश की ग्रोथ का राज है।









