
देश की उच्च शिक्षा में एक बड़ा बदलाव लाने के लिए 20 साल पहले 93वें संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया था। इस ऐतिहासिक कदम का मकसद निजी शिक्षण संस्थानों में भी पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के लिए 27% आरक्षण का रास्ता साफ करना था। उम्मीद थी कि इससे आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े छात्रों को बड़े प्राइवेट कॉलेजों में पढ़ने का मौका मिलेगा। लेकिन अफसोस की बात यह है कि दो दशक बीत जाने के बाद भी जमीनी स्तर पर इसके नतीजे निराशाजनक हैं। आज भी निजी संस्थानों में यह कोटा पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है, जिससे लाखों छात्र अपने अधिकारों और उच्च शिक्षा के इस बड़े अवसर से वंचित हैं।
निजी संस्थानों में आरक्षण
भारत के शिक्षा इतिहास में 20 जनवरी 2006 का दिन बेहद महत्वपूर्ण था, जब तत्कालीन मनमोहन सरकार ने 93वां संवैधानिक संशोधन कर अनुच्छेद 15(5) को लागू किया। इस कानून ने सरकार को यह शक्तिशाली अधिकार दिया कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC, SC और ST) की उन्नति के लिए निजी शिक्षण संस्थानों में भी विशेष प्रावधान कर सके।
इस ऐतिहासिक संशोधन का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि केवल सरकारी ही नहीं, बल्कि निजी (प्राइवेट) संस्थानों में भी एडमिशन के दौरान OBC को 27%, SC को 15% और ST को 7.5% आरक्षण का लाभ मिल सके। यह कदम उच्च शिक्षा के निजीकरण के दौर में वंचित वर्गों के छात्रों को बड़े कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में बराबरी का अवसर देने के लिए उठाया गया था।
IIT-IIM से NEET तक, जानें कब और कैसे मिला OBC छात्रों को 27% कोटा
साल 2006-07 का समय भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए एक बड़ा मोड़ था, जब 93वें संविधान संशोधन के बाद IIT, IIM, AIIMS और सेंट्रल यूनिवर्सिटीज जैसे बड़े सरकारी संस्थानों में OBC छात्रों के लिए 27% आरक्षण लागू किया गया। हालांकि, मेडिकल की पढ़ाई (NEET UG और PG) करने वाले छात्रों को इस अधिकार के लिए एक लंबा इंतजार करना पड़ा। मेडिकल कोटे में यह 27% आरक्षण आखिरकार साल 2021 में जाकर लागू हो सका। यह बदलाव दिखाता है कि देश के प्रीमियम संस्थानों में पिछड़े वर्ग के छात्रों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए कानूनी प्रक्रिया को जमीन पर उतरने में कितना समय लगा।
निजी संस्थानों में आरक्षण का संकट
यह एक कड़वा सच है कि जहाँ IIT, IIM और NIT जैसे सरकारी संस्थानों में आरक्षित वर्गों को कोटा मिल रहा है, वहीं देश के विशाल निजी (प्राइवेट) शिक्षण संस्थानों में तस्वीर बिल्कुल अलग है। आज भारत की एक बहुत बड़ी आबादी प्राइवेट इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट कॉलेजों में पढ़ती है, लेकिन यहाँ अनुच्छेद 15(5) का असर नाममात्र भी नहीं दिख रहा।
चौंकाने वाली बात यह है कि साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को वैध ठहराते हुए प्राइवेट संस्थानों में आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद संसद ने अब तक वह कानूनी ढांचा तैयार नहीं किया जिससे इसे अनिवार्य रूप से लागू किया जा सके। नतीजा यह है कि सामाजिक न्याय का यह बड़ा वादा आज भी निजी संस्थानों की ऊंची दीवारों के बाहर दम तोड़ रहा है।
20 साल बाद भी क्यों अधूरा है 15(5) का सपना?
भारत में आरक्षण हमेशा से एक चर्चा का विषय रहा है, लेकिन उच्च शिक्षण संस्थानों में इसकी हकीकत काफी जटिल है। अनुच्छेद 15(5) सरकार को निजी संस्थानों में कोटा लागू करने की शक्ति तो देता है, लेकिन यह तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक संसद या विधानसभा इसके लिए अलग से कानून न बनाए।
साल 2026 तक की स्थिति यह है कि केंद्र सरकार ने अभी तक ऐसा कोई केंद्रीय कानून नहीं बनाया है जो देश के सभी प्राइवेट कॉलेजों में आरक्षण अनिवार्य कर सके; 2006 का कानून सिर्फ सरकारी (केंद्रीय) संस्थानों तक सीमित है। हालांकि, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने अपने स्थानीय कानून बनाकर इस दिशा में पहल की है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एक ठोस कानूनी ढांचे के अभाव में लाखों छात्र आज भी इस लाभ से वंचित हैं।
सरकारी कॉलेजों की होड़ और प्राइवेट कोटा
आज के दौर में इंजीनियरिंग (IIT-JEE), मेडिकल (NEET) और मैनेजमेंट कोर्सेज में प्रवेश पाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। लाखों छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं ताकि उन्हें सरकारी कॉलेजों में जगह मिल सके, क्योंकि निजी संस्थानों की भारी-भरकम फीस हर किसी के बस की बात नहीं होती।
उम्मीदवारों की भारी संख्या के कारण कॉम्पिटिशन का स्तर बहुत ऊंचा हो गया है। इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान अनुच्छेद 15(5) को निजी संस्थानों में पूरी तरह लागू करना हो सकता है। यदि प्राइवेट कॉलेजों में आरक्षित वर्गों के लिए सीटें सुरक्षित की जाएं और उनकी फीस को लेकर भी नीतियां बनें, तो सरकारी कॉलेजों पर से छात्रों का दबाव काफी हद तक कम हो सकता है। इससे न केवल छात्रों को प्रवेश के अधिक अवसर मिलेंगे, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में समानता भी आएगी।









