
बिलासपुर हाई कोर्ट ने वैवाहिक रिश्तों को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट के अनुसार, यदि किसी पति को अपनी पत्नी की पिछली गलतियों या उसके व्यवहार (क्रूरता) की जानकारी है, लेकिन फिर भी वह उसके साथ सामान्य रूप से रहता है, तो कानूनी तौर पर यह मान लिया जाएगा कि पति ने उन गलतियों को स्वीकार कर माफ कर दिया है। इस बड़े फैसले के साथ हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को पलट दिया जिसमें पति को तलाक की मंजूरी दी गई थी। कोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि पुराने विवादों को आधार बनाकर लंबे समय बाद तलाक की मांग करना न्यायसंगत नहीं है।
बिलासपुर हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की तलाक की अर्जी?
यह कानूनी मामला साल 2003 में शुरू हुई एक शादी से जुड़ा है। विवाह के पांच साल बाद, पत्नी ने पति और ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न (धारा 498-A) का गंभीर आरोप लगाया। हालांकि, 2009 में कोर्ट ने पति को इन आरोपों से बरी कर दिया। चौंकाने वाली बात यह रही कि केस जीतने के बाद भी पति ने पत्नी से दूरी नहीं बनाई, बल्कि वे दोनों 2010 से 2017 तक यानी पूरे सात साल तक पति-पत्नी के रूप में एक साथ रहे। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने माना कि पति ने पत्नी के पिछले व्यवहार को पूरी तरह स्वीकार कर लिया था, जिससे अब पुराने आधार पर तलाक की मांग करना कानूनी रूप से कमजोर हो गया।
‘अवैध संबंधों’ के बाद भी साथ रहना माना जाएगा माफी
इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब पति ने 2020 में पत्नी पर अवैध संबंधों और क्रूरता का आरोप लगाकर तलाक माँगा। पति का दावा था कि पत्नी को किसी गैर मर्द के साथ देखा गया था, जिसे लेकर गाँव में पंचायत भी हुई थी। निचली अदालत ने तो तलाक दे दिया, लेकिन हाई कोर्ट ने इस पर असहमति जताई। बेंच ने गौर किया कि पति को पत्नी के कथित संबंधों की जानकारी अक्टूबर 2017 में ही मिल गई थी, फिर भी वह दिसंबर तक उसके साथ रहा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जानकारी होने के बावजूद साथ रहना इस बात का प्रमाण है कि पति ने अपनी मर्जी से उन गलतियों को माफ कर दिया था।
हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1) का हवाला
बिलासपुर हाई कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13(1) का संदर्भ देते हुए एक बड़ा निर्णय सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून उन पुरानी घटनाओं के आधार पर तलाक की अनुमति नहीं देता, जिन्हें जीवनसाथी ने पहले ही स्वीकार या माफ कर दिया हो। जजों ने पति द्वारा देरी से लगाए गए आरोपों को संदिग्ध पाया और माना कि लंबे समय तक साथ रहकर पति ने अपनी शिकायतों को खत्म कर दिया था। इसी आधार पर, हाई कोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार कर ली और निचली अदालत द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया।









