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खेती की जमीन में बेटियों का कितना हिस्सा? सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद बदल गया बंटवारे का नियम, जानें कानूनी अधिकार।

बेटियों का खेती की जमीन पर बराबर हक! हिंदू उत्तराधिकार कानून 2005: बेटी बेटे जितना हिस्सा पाएगी, शादीशुदा हो या नहीं। पार्टिशन डीड या कोर्ट से बंटवारा। पिता की मौत 2005 से पहले भी दावा। भाई न दें तो नोटिस भेजें। गांवों में महिलाओं की ताकत बनेगी ये जमीन!

By Pinki Negi

खेती की जमीन में बेटियों का कितना हिस्सा? सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद बदल गया बंटवारे का नियम, जानें कानूनी अधिकार।

गांवों में जमीन तो बस जमीन नहीं, ये परिवार की इज्जत, भविष्य और सुरक्षा की गारंटी है। लेकिन सालों से ये देखा गया कि बेटों को तो पूरा हक मिलता रहा, बेटियों को अक्सर ठेंगा दिखा दिया जाता। अब वक्त बदल चुका है। सुप्रीम कोर्ट और कानूनों ने साफ कह दिया कि बेटियां भी बेटों जितना हकदार हैं। खासकर खेती की जमीन पर। आइए, सरल भाषा में समझते हैं कि ये हक कैसे मिलता है और क्या करें अगर कोई रोके।

खेती की जमीन क्यों इतनी खास?

ग्रामीण भारत में खेती की जमीन परिवार की रीढ़ है। ये न सिर्फ फसल उगाती है, बल्कि बुढ़ापे की लाठी भी बनती है। पुरानी सोच थी कि बेटी विदा हो गई, उसका मायके पर कोई अधिकार नहीं। लेकिन 2005 का हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून ने ये मिथक तोड़ दिया। अब बेटी जन्म से ही पैतृक संपत्ति की मालकिन है। चाहे शादीशुदा हो या कुंवारी, फर्क नहीं पड़ता। सुप्रीम कोर्ट ने हाल के फैसलों में दोहराया कि बेटा-बेटी बराबर के वारिस। हिमाचल, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी यही नियम लागू।

बेटियों को कितना और कैसे मिलता है हिस्सा?

बेटी को पिता की खेती की जमीन में बेटे जितना ही हिस्सा मिलेगा। अगर संपत्ति चार पीढ़ियों पुरानी है, तो ये पैतृक मानी जाती है और बेटी का जन्मजात हक बनता है। पिता की मौत 2005 से पहले भी हुई हो, तब भी बेटी दावा कर सकती है। उदाहरण लीजिए, अगर पिता के चार बेटे-बेटियां हैं, तो पांचों को बराबर भाग। राज्य के राजस्व कानून थोड़े अलग हो सकते हैं, जैसे यूपी में अविवाहित बेटियों को प्राथमिकता। लेकिन केंद्र का कानून सर्वोपरि है। अब भाईयों को बहन का हक छीनना कानूनी अपराध।

जमीन का बंटवारा कैसे होता है?

परिवार में सब सहमत हों, तो सबसे आसान। सब मिलकर फैसला लो कि किसे कितनी जमीन। एक पार्टिशन डीड बनाओ, रजिस्ट्रार ऑफिस में रजिस्टर कराओ। फिर राजस्व विभाग नए खतौनी-खसरा नंबर जारी करेगा। अगर झगड़ा हो, तो चिंता मत करो। बेटी तहसीलदार या एसडीएम के पास आवेदन दे सकती है। अधिकारी जमीन नापेंगे और बराबर बांटेंगे। या सिविल कोर्ट में पार्टिशन सूट फाइल करो। कोर्ट हर वारिस को हक दिलाएगा। प्रक्रिया में 6 महीने से साल लग सकता है, लेकिन जीत निश्चित अगर कागज सही हों।

अगर हक न मिले तो क्या कदम उठाएं?

बहनें, अगर भाई हिस्सा न दें, तो हार मत मानना। पहले वकील से नोटिस भेजो सभी को। जवाब न आए तो राजस्व कोर्ट या सिविल कोर्ट जाओ। जरूरी कागज: जन्म प्रमाण, पिता का डेथ सर्टिफिकेट, जमीन के रिकॉर्ड। कई केस में कोर्ट ने बेटियों को न सिर्फ जमीन दी, बल्कि बकाया आय भी। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता जैसी राज्य कानून अविवाहित बेटियों को एक्स्ट्रा सुरक्षा देती हैं। याद रखो, समय सीमा है – मौत के 12 साल में दावा करो। वकील चुनो जो जमीन मामलों का एक्सपर्ट हो।

ये बदलाव क्यों जरूरी और भविष्य क्या?

ये कानून महिलाओं को सशक्त बनाएंगे। बेटियां आर्थिक रूप से मजबूत होंगी, परिवार टूटेंगे नहीं। गांवों में लड़कियां पढ़ाई-खेती में आगे बढ़ेंगी। सरकार भी जागरूकता अभियान चला रही। लेकिन असली बदलाव सोच से आएगा। भाइयों, बहनों को उनका हक दो, वरना कानून देगा। अगर आपकी फैमिली में ऐसा मुद्दा है, तो आज ही एक्शन लो। ये आपका अधिकार है, इसे जियो!

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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