
पिछले कुछ समय से देश के विभिन्न राज्यों, जैसे असम, बिहार और पश्चिम बंगाल में जनसांख्यिकीय बदलाव (डेमोग्राफी) को लेकर काफी चर्चा हो रही है। इसी कड़ी में असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर एक कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जिसका उद्देश्य स्थानीय संतुलन को बनाए रखना है।
दरअसल, कई इलाकों में हिंदुओं की घटती आबादी और बड़े पैमाने पर जमीन के हस्तांतरण के मुद्दों के बीच यह कदम उठाया गया है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने असम सरकार के इस फैसले का समर्थन करते हुए इसे पूरे देश में लागू करने की मांग की है। हालांकि, यह नियम किसी धर्म विशेष के जमीन खरीदने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि घुसपैठ और अवैध कब्जे जैसे संवेदनशील मुद्दों को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और नियंत्रित बनाता है।
असम में जमीन की रजिस्ट्री के नए नियम
असम सरकार ने राज्य की बदलती डेमोग्राफी (आबादी के संतुलन) को नियंत्रित करने के लिए जमीन हस्तांतरण (Land Transfer) के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए कैबिनेट फैसले के अनुसार, अब अलग-अलग धर्म के व्यक्तियों (विशेषकर हिंदू और मुस्लिम) के बीच जमीन की खरीद-बिक्री के लिए जिला उपायुक्त (DC) या डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) से औपचारिक अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
सरकार का मानना है कि यह कदम संवेदनशील इलाकों में भूमि के अनियंत्रित हस्तांतरण को रोकने में मददगार होगा। हालांकि, यह कानून सीधे तौर पर किसी को जमीन खरीदने से नहीं रोकता, लेकिन अनुमति की प्रक्रिया अनिवार्य होने से अब यह सौदा पहले जैसा आसान नहीं रहा।
‘लैंड जिहाद’ पर प्रहार या सुरक्षा चक्र? असम में जमीन रजिस्ट्री के लिए अब देनी होगी ‘अग्निपरीक्षा’
मुख्यमंत्री हिमंता विस्व सरमा ने जमीन हस्तांतरण के नए नियमों के पीछे ‘लैंड जिहाद’ और ‘डेमोग्राफिक चेंज’ (आबादी का बदलता स्वरूप) को मुख्य कारण बताया है। सरकार का तर्क है कि राज्य के कई जिलों में हिंदू समुदाय की जमीनें संदिग्ध परिस्थितियों में दूसरे समुदाय के हाथों में जा रही थीं। यह भी आरोप लगे कि डरा-धमका कर या गरीबी का फायदा उठाकर लोगों से औने-पौने दामों पर जमीनें लिखवाई जा रही हैं। इन्हीं चिंताओं को देखते हुए अब जिला प्रशासन को ‘चेकपोस्ट’ बना दिया गया है। अब कोई भी अंतर-धार्मिक (Inter-faith) जमीन सौदा तब तक मुकम्मल नहीं होगा, जब तक जिला उपायुक्त की जांच रिपोर्ट हरी झंडी न दे दे।
असम का नया भूमि कानून
नए नियमों की 5 बड़ी बातें
- अनिवार्य अनुमति: अब अलग-अलग धर्मों के बीच जमीन की खरीद-बिक्री के लिए जिला उपायुक्त (DC) की लिखित मंजूरी लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
- सुरक्षा का उद्देश्य: इस कानून का प्राथमिक लक्ष्य स्थानीय लोगों की जमीन को सुरक्षित करना और ‘लैंड जिहाद’ जैसी कथित गतिविधियों पर लगाम लगाना है।
- स्वैच्छिक जांच: जिला प्रशासन गहराई से यह जांच करेगा कि जमीन बेचने वाला अपनी स्वेच्छा से ऐसा कर रहा है या उसे डरा-धमकाकर मजबूर किया गया है।
- फोकस एरिया: यह नियम विशेष रूप से निचले असम के उन जिलों और सीमावर्ती इलाकों में कड़ाई से लागू है जहाँ जनसंख्या का संतुलन तेजी से बदला है।
- समान धर्म में छूट: यदि खरीदार और विक्रेता एक ही धर्म के हैं, तो उन पर यह नया प्रतिबंध लागू नहीं होगा; वे सामान्य प्रक्रिया से रजिस्ट्री कर सकते हैं।
असम की सीमा और बदलती जनसांख्यिकी
असम की भौगोलिक बनावट उसे बेहद संवेदनशील बनाती है, क्योंकि इसकी एक लंबी और दुर्गम सीमा बांग्लादेश से लगती है। पिछले कई दशकों से यह चिंता जताई जाती रही है कि सीमा पार से अवैध घुसपैठ के कारण असम के कई जिलों—जैसे धुबरी, गोलपारा, बारपेटा और नगांव—में जनसंख्या का संतुलन (Demographic Ratio) पूरी तरह बदल गया है।
1971 के बाद से इन इलाकों में स्वदेशी आबादी की तुलना में दूसरे समुदाय की संख्या में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का तर्क है कि यदि जमीन के हस्तांतरण पर लगाम नहीं लगाई गई, तो मूल निवासी अपनी ही विरासत और जमीन पर अल्पसंख्यक बनकर रह जाएंगे। इसी खतरे को देखते हुए, नए भूमि नियमों को एक ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में पेश किया गया है ताकि स्थानीय लोगों के अस्तित्व को बचाया जा सके।
पूर्वोत्तर में जमीन की सुरक्षा का नया मॉडल
असम सरकार ने स्पष्ट किया है कि जमीन हस्तांतरण के नए नियम केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया हैं, जिसका मकसद जमीन के अधिकारों के गलत इस्तेमाल को रोकना है। गौरतलब है कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों जैसे मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में इनर लाइन परमिट (ILP) और छठी अनुसूची के तहत पहले से ही अत्यंत कड़े कानून लागू हैं, जो गैर-आदिवासियों को जमीन खरीदने से रोकते हैं।
असम में इस तरह के सुरक्षा कवच की कमी थी, जिसका लाभ उठाकर बाहरी तत्वों ने बड़े पैमाने पर जमीनों पर अधिकार जमाना शुरू कर दिया था। अब असम के इस कड़े रुख के बाद त्रिपुरा और मणिपुर जैसे राज्यों में भी इसी तरह के प्रशासनिक नियंत्रण की मांग तेज हो गई है।









