
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए लगभग दो दशक बाद शहरी सहकारी बैंकों (UCB) को नए लाइसेंस देने की तैयारी शुरू कर दी है। साल 2004 में इन बैंकों की खराब माली हालत और ग्राहकों के पैसों पर बढ़ते जोखिम को देखते हुए नए लाइसेंस पर रोक लगा दी गई थी। अब आरबीआई ने एक ‘चर्चा पत्र’ जारी कर नए बैंकों के लिए पहले से कहीं अधिक सख्त नियम और शर्तें प्रस्तावित की हैं। इस योजना पर आम लोगों और विशेषज्ञों से 13 फरवरी 2026 तक सुझाव मांगे गए हैं, ताकि भविष्य में ये बैंक आर्थिक रूप से मजबूत रहें और जमाकर्ताओं का पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहे।
नए शहरी सहकारी बैंक के लिए अब चाहिए 300 करोड़ की पूंजी
भारतीय रिजर्व बैंक ने नए शहरी सहकारी बैंकों (UCB) के लाइसेंस के लिए मानकों को काफी सख्त बनाने का प्रस्ताव दिया है। पीटीआई-भाषा के अनुसार, अब नया बैंक खोलने के लिए न्यूनतम पूंजी (Minimum Capital) की सीमा बढ़ाकर 300 करोड़ रुपये करने का सुझाव दिया गया है।
आरबीआई का तर्क है कि बढ़ती महंगाई और बैंकिंग सेक्टर की आधुनिक जरूरतों को देखते हुए इतनी पूंजी अनिवार्य है। इसके अलावा, अब कोई भी नई संस्था सीधे बैंक नहीं खोल सकेगी; लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाली सहकारी ऋण समिति के पास कम से कम 10 वर्षों का कार्य अनुभव होना चाहिए। साथ ही, पिछले 5 वर्षों का उनका वित्तीय रिकॉर्ड पूरी तरह स्थिर और संतोषजनक होना भी अनिवार्य किया गया है।
आरबीआई की निगरानी में 82 कमजोर सहकारी बैंक
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को सुरक्षित बनाने के लिए कड़े कदम उठा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में आरबीआई ने 57 दिवालिया शहरी सहकारी बैंकों के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं, जो वित्तीय रूप से पूरी तरह विफल हो चुके थे। वर्तमान में देश के 82 कमजोर बैंक आरबीआई की सीधी निगरानी में हैं, ताकि जमाकर्ताओं का पैसा सुरक्षित रहे। इन बैंकों को उनकी वित्तीय स्थिति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखकर सुधारात्मक कार्रवाई की जा रही है।
क्यों केवल बड़ी समितियों को ही मिलेगा लाइसेंस? आरबीआई ने बताई वजह
भारतीय रिजर्व बैंक का विश्लेषण बताता है कि पिछले सालों में बंद होने वाले अधिकांश बैंक छोटे आकार के शहरी सहकारी बैंक थे। इसी कड़वे अनुभव से सीख लेते हुए, आरबीआई ने अब “मजबूत संस्था, सुरक्षित बैंकिंग” का मंत्र अपनाया है। नए लाइसेंस की दौड़ में केवल उन्हीं सहकारी ऋण समितियों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनका पिछला ट्रैक रिकॉर्ड लंबा और प्रशासनिक ढांचा (Management) बहुत मजबूत है। आरबीआई का मानना है कि बड़ी और अनुभवी संस्थाओं के पास वित्तीय चुनौतियों से निपटने की बेहतर क्षमता होती है, जिससे नए बैंक के डूबने का खतरा कम होगा और आम जनता का भरोसा बैंकिंग सिस्टम पर बना रहेगा।
12% CRAR और 3% से कम NPA अनिवार्य
आरबीआई ने स्पष्ट कर दिया है कि नया बैंक खोलने का लाइसेंस केवल उन्हीं संस्थाओं को मिलेगा जो वित्तीय रूप से बेहद अनुशासित होंगी। इसके लिए दो मुख्य मानक तय किए गए हैं:
- पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR) – 12%: आवेदन के समय संस्था का CRAR कम से कम 12 प्रतिशत होना चाहिए। इसका मतलब है कि बैंक के पास उसके जोखिम भरे निवेश (जैसे लोन) के मुकाबले पर्याप्त सुरक्षित पूंजी मौजूद है। यह अनुपात जितना अधिक होता है, बैंक उतना ही सुरक्षित माना जाता है।
- नेट एनपीए (Net NPA) – 3% से कम: संस्था का शुद्ध एनपीए (फंसा हुआ कर्ज) 3 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। यह शर्त इसलिए रखी गई है ताकि बैंक की शुरुआत बिना किसी पुराने डूबे हुए कर्ज के बोझ के हो और जमाकर्ताओं का पैसा सुरक्षित रहे।
5.84 लाख करोड़ की जमा राशि
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़े गवाही देते हैं कि शहरी सहकारी बैंक (UCB) भारत की अर्थव्यवस्था, विशेषकर छोटे शहरों और अर्ध-शहरी इलाकों के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। 31 मार्च 2025 तक के डेटा के अनुसार, देश में कुल 1,457 शहरी सहकारी बैंक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इन बैंकों में आम जनता की 5.84 लाख करोड़ रुपये की जमा राशि (Deposits) है, जबकि इनकी कुल संपत्ति (Assets) 7.38 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच चुकी है।
आरबीआई का नए लाइसेंस देने का यह कदम इस बड़े सेक्टर को और अधिक आधुनिक, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की एक सोची-समझी कोशिश है।









