
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि संपत्ति के झगड़ों में पंजीकृत (रजिस्टर्ड) वसीयत को ही प्राथमिकता दी जाएगी। वाराणसी के एक मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पिता द्वारा अपनी बेटी के नाम की गई रजिस्टर्ड वसीयत को सही माना, जबकि बाद में भतीजों द्वारा पेश की गई दूसरी वसीयत को फर्जी करार दे दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि कानूनी उत्तराधिकार के लिए वसीयत का आधिकारिक तौर पर दर्ज होना अनिवार्य है, ताकि धोखाधड़ी से बचा जा सके।
दो वसीयतों के बीच कानूनी जंग
यह पूरा विवाद परमानंद लाल श्रीवास्तव की संपत्ति को लेकर था, जिनकी मृत्यु के बाद दो अलग-अलग वसीयतें सामने आईं। पहली वसीयत 1996 में रजिस्टर्ड करवाई गई थी, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति अपनी बेटी और नातियों के नाम की थी। दूसरी ओर, उनके भतीजों ने 2002 की एक अनरजिस्टर्ड (अपंजीकृत) वसीयत पेश करते हुए दावा किया कि उनके चाचा ने पुरानी वसीयत रद्द कर संपत्ति उनके नाम कर दी थी। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद भतीजों के दावे को संदिग्ध माना और रजिस्टर्ड वसीयत के पक्ष में फैसला सुनाया।
विरोधाभासी बयानों के कारण कोर्ट ने भतीजों की वसीयत को माना फर्जी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भतीजों द्वारा पेश की गई 2002 की वसीयत को पूरी तरह संदिग्ध करार दिया है। कोर्ट ने पाया कि वसीयत पेश करने वाले राकेश श्रीवास्तव ने इसके बनने की जगह को लेकर बार-बार अपने बयान बदले, जिससे उनकी सच्चाई पर सवाल खड़े हो गए। इसके अलावा, एक बड़ा खुलासा यह भी हुआ कि पिता की मृत्यु के बाद जब भतीजों ने जमीन अपने नाम कराने के लिए आवेदन किया था, तब उन्होंने इस वसीयत का कोई जिक्र ही नहीं किया था। इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि यह वसीयत बाद में जालसाजी से तैयार की गई थी।
गवाहों के लालच और संदिग्ध दावों ने खोली भतीजों की पोल
कोर्ट ने वसीयत के गवाह लालजी के बयानों को अविश्वसनीय माना, क्योंकि यह सामने आया कि मुख्य पैरोकार राकेश श्रीवास्तव ने लालजी की पत्नी के नाम जमीन की रजिस्ट्री की थी, जिससे गवाह की निष्पक्षता खत्म हो गई। इसके अलावा, कोर्ट ने तार्किक आधार पर भतीजों के दावों को खारिज करते हुए कहा कि 83 वर्ष की आयु में कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण बिस्तर पर पड़े व्यक्ति के लिए खुद वसीयत टाइप करना असंभव और अव्यावहारिक है। इन सभी तथ्यों ने साबित कर दिया कि 2002 की वसीयत पूरी तरह मनगढ़ंत थी।
हाईकोर्ट ने खारिज की भतीजों की अपील, बेटी के पक्ष में सुनाया अंतिम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि यदि किसी वसीयत पर शक की गुंजाइश हो, तो उसे सच साबित करने की जिम्मेदारी उसे पेश करने वाले व्यक्ति की होती है। इस मामले में भतीजे वसीयत से जुड़ी संदिग्ध परिस्थितियों को स्पष्ट करने में नाकाम रहे। परिणामस्वरूप, न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने भतीजों की अपीलों को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें बेटी सुधा श्रीवास्तव को संपत्ति का असली वारिस मानते हुए उसके पक्ष में फैसला सुनाया गया था।









