
बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई किसान मुआवज़ा बढ़ाने की मांग करता है, तो उसके आवेदन को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि उसके पास किसी आदेश की ‘सर्टिफाइड कॉपी’ (प्रमाणित प्रति) नहीं है। अदालत ने जोर देकर कहा कि कानून का मकसद उन किसानों को समान हक दिलाना है जिनकी जमीन छीनी गई है। चूँकि खेती ही किसानों की रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया होती है, इसलिए केवल छोटी-मोटी तकनीकी गलतियों या कागजी प्रक्रियाओं की वजह से उन्हें उनके कानूनी लाभ से वंचित करना पूरी तरह गलत है।
96 साल के बुजुर्ग किसान की कानूनी लड़ाई
बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस एम. एस. कर्णिक और जस्टिस अजीत बी. कडेथंकर की बेंच ने एक बेहद भावुक मामले की सुनवाई की। मामला एक 96 वर्षीय बुजुर्ग किसान का है, जिसकी जमीन ‘किटवाड़ माइनर इरिगेशन प्रोजेक्ट’ के लिए ली गई थी और बदले में उसे केवल ₹77,700 का मुआवजा मिला।
उसी प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित की गई बगल की जमीन के मालिक को कानूनी लड़ाई के बाद ज्यादा मुआवजा मिल गया। जब बुजुर्ग किसान ने भी इसी आधार पर अपना मुआवजा बढ़ाने की मांग की, तो मामला कोर्ट पहुंचा। अदालत अब इस बात की जांच कर रही है कि एक ही प्रोजेक्ट के लिए दो अलग-अलग जमीनों के मालिकों को मिलने वाले लाभ में इतना अंतर क्यों है।
समय पर आवेदन के बावजूद खारिज हुई मांग
जब बुजुर्ग किसान को पता चला कि उनके पड़ोसी को कोर्ट के आदेश से ज्यादा मुआवजा मिला है, तो उन्होंने भी कानून के अनुसार 1 नवंबर 2008 को मुआवजे को फिर से तय करने की अर्जी दी। हालांकि उन्होंने यह अर्जी कोर्ट के फैसले के 3 महीने के भीतर (नियत समय में) दाखिल कर दी थी, फिर भी अधिकारियों ने इसे 11 साल तक लटकाए रखा। आखिरकार, 14 फरवरी 2019 को उप-विभागीय अधिकारी (SDO) ने इसे केवल इस तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया कि आवेदन के साथ फैसले की ‘सर्टिफाइड कॉपी’ (प्रमाणित प्रति) नहीं लगाई गई थी।
बॉम्बे हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि मुआवजे के आवेदन को सिर्फ इसलिए खारिज करना गलत है क्योंकि किसान ने ‘सर्टिफाइड कॉपी’ की जगह फैसले की साधारण फोटोकॉपी लगाई थी। कोर्ट ने साफ किया कि धारा 28-A का असली मकसद किसानों को समय पर न्याय दिलाना है, न कि उन्हें कागजी उलझनों में फंसाना।
अदालत ने जोर देकर कहा कि ‘सर्टिफाइड कॉपी’ केवल यह देखने के लिए मांगी जाती है कि आवेदन समय पर किया गया है या नहीं। चूंकि जमीन छिनने से किसान की आजीविका खत्म हो जाती है, इसलिए कानून की व्याख्या उदार होनी चाहिए ताकि प्रक्रिया न्याय के रास्ते में बाधा न बने।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य मशीनरी को याद दिलाई जिम्मेदारी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रियाओं का काम न्याय को आसान बनाना है, न कि उसे रोकना। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी मामले का फैसला उसकी मेरिट (तथ्यों) के आधार पर होना चाहिए, न कि छोटी-मोटी तकनीकी खामियों के आधार पर। अदालत ने राज्य सरकार को आइना दिखाते हुए कहा कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह जमीन गंवाने वाले किसानों को उनके बढ़े हुए मुआवजे के हक के प्रति जागरूक करे। कोर्ट के अनुसार, सरकार को किसानों के दावों को किसी दुश्मन के साथ चल रही ‘मुकदमेबाजी’ की तरह नहीं देखना चाहिए, बल्कि उनकी मदद करनी चाहिए।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द किया सरकारी आदेश, कहा- “मुआवजा मांगना किसान का हक”
बॉम्बे हाईकोर्ट ने किसानों के पक्ष में एक बेहद मानवीय और कानूनी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि अपनी जमीन खोने वाले किसान पहले से ही सदमे और निराशा में होते हैं, ऐसे में उन्हें तकनीकी गलतियों के लिए दोष देना गलत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे में बढ़ोतरी मांगना किसान का कानूनी अधिकार है और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उन्हें इसके लिए जागरूक करे। अपनी विशेष शक्तियों (Article 226) का इस्तेमाल करते हुए, हाईकोर्ट ने पुराना आदेश रद्द कर दिया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कागजों की कमी का बहाना छोड़कर मामले का फैसला योग्यता (Merit) के आधार पर करें।









